सिनेमा का सिस्टम: बड़े पर्दे या आजकल ओटीटी पर कई बार हम एक्टर्स को देखकर हैरान हो जाते हैं या फिर उन्हें पहचान नहीं पाते। अपने किरदार के लिए एक्टर ने खुद को पूरी तरह बदल लिया होता है। इसके पीछे एक्टर की महीनों की मेहनत, तैयार और समर्पण होता है। अपने एक-एक किरदार को असली बनाने के लिए एक्टर्स को शारीरिक, मानसिक और इमोशनली भी खुद को उस किरदार में पूरी तरह ढालना पड़ता है और इसे कहते हैं मेथड एक्टिंग। ये एक ऐसी तकनीक है, जिसमें कलाकार केवल डायलॉग नहीं बोलता, बल्कि उस किरदार की भावनाओं, सोच और अनुभवों को वास्तव में महसूस करके जीने लगता है।

कैसे की जाती है मेथड एक्टिंग

इसके लिए एक्टर्स जो किरदार निभा रहे हैं उसकी तरह जीने लगते हैं। उस किरदार की आदतों को जानने के बाद खुद के अंदर उसी भावना को जगाने लगते हैं। इसके अलावा वो रियल लाइफ ऑब्जर्वेशन करने के लिए उस किरदार की तरह जिंदगी जी रहे लोगों को देखते हैं और उन्हें करीब से जानने की कोशिश करते हैं। इतना ही नहीं जब एक्टर शूटिंग भी करते हैं तो वो सेट के बाहर भी उसी किरदार में रहते हैं और उससे बाहर नहीं आते। इसके अलावा वो खुद के शरीर पर भी बहुत काम करते हैं। जैसे जरूरत के हिसाब से वजन बढ़ाना या घटाना, बॉडी लैंग्वेज पर काम करना और आवाज तक बदल लेना। भले ही एक्टर्स को उनके किरदार के लिए बहुत ज्यादा पैसा मिलता है, लेकिन उन्हें इसे करने में मानसिक रूप से काफी तकलीफों का सामना भी करना पड़ सकता है। क्योंकि कई बार उन्हें अपने किरदार से बाहर आने में बहुत अधिक समय लग जाता है।

क्योंकि मेथड एक्टिंग का मकसद सिर्फ अच्छा अभिनय करना नहीं होता, बल्कि किरदार को सच में जीवित करना होता है। कई बार एक्टर्स खुद को भूलकर वास्तव में किरदार में इतना घुस जाते हैं कि बड़े पर्दे पर दर्शकों को भी वो किरदार सच लगने लगता है।

मेथड एक्टिंग के लिए मशहूर हुए ये एक्टर्स

बॉलीवुड में मेथड एक्टिंग की बात हो और दिलीप कुमार का नाम न आए, ऐसा संभव नहीं। 1950-60 के दौर में उन्होंने जिस तरह किरदार को कुछ इस तरह स्क्रीन पर उतारा उसे ही हिंदी सिनेमा में मेथड एक्टिंग की बुनियाद माना जाने लगा। वो सिर्फ डायलॉग नहीं बोलते थे बल्कि किरदार के दर्द, प्रेम और संघर्ष को जीते थे। उनके बाद इस परंपरा को कई बड़े कलाकारों ने आगे बढ़ाया। अमिताभ बच्चन, नसीरुद्दीन शाह, इरफान खान जैसे एक्टर्स ने मेथड एक्टिंग को नई ऊंचाई दी। वहीं नवाजुद्दीन सिद्दीकी और मनोज बाजपेयी ने किरदार की मनोस्थिति को बारीकी से पकड़ने की कला दिखाई, जिससे उनके रोल बेहद सच्चे लगे।

इन एक्टर्स ने भी दिखाया अपना हुनर

आमिर खान

आमिर खान को इंडस्ट्री का मिस्टर परफेक्निस्ट जाता है, क्योंकि वो अपने हर किरदार को इतना बखूबी निभाते हैं। वो किरदार के लिए खुद को तैयार करने में महीनों लगा देते हैं और इसका सबसे बड़ा उदाहरण है ‘दंगल’। जिसमें उन्होंने खुद को एक पहलवान दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। उन्होंने पहले 90 किलो से ज्यादा वजन बढ़ाया, फिर उसी फिल्म के लिए एथलीट जैसा फिट शरीर बनाया। इसके अलावा ‘गजनी’ में 8 पैक एब्स के लिए उन्होंने कड़ी ट्रेनिंग ली और सख्त डाइट फॉलो की। उनका मानना है कि अगर किरदार असली लगेगा, तभी कहानी दर्शकों तक पहुंचेगी।

रणवीर सिंह

इन एक्टर्स के अलावा रणवीर सिंह ने भी मेथड एक्टिंग करने में महारत हासिल की है। रणवीर सिंह बॉलीवुड में अपनी गहन मेथड एक्टिंग के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने’पद्मावत’ के खिलजी या ‘बाजीराव मस्तानी’ फिल्म में अपने किरदारों के लिए खुद को पूरी तरह बदल दिया। वे किरदार की मानसिक और शारीरिक स्थिति में ढलने के लिए खुद को अलग-थलग कर लेते हैं, यहां तक कि उन्हें अपने किरदार से निकलने के लिए थेरेपी जरूरत तक पड़ चुकी है।

भूमि पेडनेकर

अपनी पहली ही फिल्म के लिए भूमि पेडनेकर ने कमाल की मेथड एक्टिंग को अपनाया था। ‘दम लगा के हईशा’ के लिए उन्होंने करीब 30 किलो वजन बढ़ाया था। हालांकि बाद में उसी प्रोफेशन में फिटनेस के जरिए खुद को दोबारा ट्रांसफॉर्म किया। मगर एक किरदार के लिए उन्होंने बड़ा जोखिम उठाया था।

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राजकुमार राव

राजकुमार राव भी हिंदी सिनेमा के सबसे समर्पित मेथड एक्टर्स में से एक हैं, जो किरदार की गहराई में उतरने के लिए शारीरिक और मानसिक बदलाव और गहरी रिसर्च करते हैं। उन्होंने ‘ट्रैप्ड’ फिल्म के लिए खुद को पूरी तरह बदल लिया था। एक कमरे में ट्रैप हुए शख्स की हालत कैसी हो सकती है, ये राजकुमार राव ने स्क्रीन पर बखूबी दिखाया। इसके अलावा भी उन्होंने हर किरदार के लिए मेथड एक्टिंग का सहारा लिया है।

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आसान नहीं मेथड एक्टिंग

कई बार कलाकार किरदार की मानसिक स्थिति से बाहर आने में समय लेते हैं। कुछ मामलों में ये एक्टर्स को इमोशनली बहुत ज्यादा थका या दुखी कर देती है। जैसे रणवीर सिंह ने अपने कई इंटरव्यू में इसके बारे में बात की है, एक्टर्स को वाकई प्रोफेशनल मार्गदर्शन से खुद को बाहर निकालना पड़ता है।