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‘शूटिंग सुबह की होती और एक्टर शाम को आता था…’ आशा पारेख ने बताया- किस वजह से छोड़ दी थी फिल्म इंडस्ट्री

आशा पारेख ने कहा कि इंडस्ट्री में पुरुषों को ज्यादा महत्व दिया जाता था।

आशा पारेख|| Asha parekh
आशा पारेख (फाइल फोटो)

बॉलीवुड की सदाबहार एक्ट्रेस आशा पारेख ने साल 1959 में शम्मी कपूर के साथ फिल्म ‘दिल देके देखो’ से बॉलीवुड में कदम रखा था। हालांकि इससे पहले भी आशा पारेख ने चाइल्ड आर्टिस्ट के रूप में साल 1952 में आई फिल्म ‘मां’ और साल 1954 में फिल्म ‘बाप-बेटी’ में अभिनय किया था। आशा पारेख ने अपने करियर में कई हिट फिल्में दीं, लेकिन एक समय ऐसा आ गया था जब उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री छोड़ने का मन बना लिया था।

मां का रोल मिलने से खुश नहीं थी: एक पुराने इंटरव्यू में आशा ने बताया था कि एक फिल्म में उन्हें मां के रोल के लिए अप्रोच किया गया था। जिससे वो खुश नहीं थीं। उस समय को याद करते हुए एक्ट्रेस ने कहा कि इंडस्ट्री में पुरुष कलाकारों को ज्यादा अहमियत दी जाती थी। उनके साथी कलाकार सुबह के शूट के लिए शाम को सेट पर पहुंचा करते थे। जिससे उन्हें परेशानी होती थी।

अभिनेता अमिताभ बच्चन के बारे में बात करते हुए, आशा ने कहा कि उनके करियर की दूसरी पारी में उन्हें मुख्य किरदार के रूप में लिया गया था, जबकि आशा को ऐसा मौका नहीं दिया गया।

मन मारकर किया मां का रोल: पीटीआई से बातचीत में आशा ने बताया था, ”करियर के दूसरे पड़ाव में मुझे कम काम मिलने लगा। लोग मुझे मां के किरदार के लिए अप्रोच करने लगे। मैंने कुछ फिल्मों में वो किरदार निभाया भी, लेकिन मैं इससे खुश नहीं थी। मुझे लगने लगा था कि जो मैं कर रही हूं वो सही नहीं है। मुझे याद है एक फिल्म के शूट के समय मुझे लगने लगा था कि मुझे टॉर्चर किया जा रहा है। क्योंकि सुबह 9:30 बजे के शूट के लिए हीरो शाम को 6:30 बजे पहुंच रहा था।”

”मैं एक शॉट के लिए सुबह से शाम तक इंतजार नहीं करना चाहती थी। तब मैंने तय किया कि मुझे अब और काम नहीं करना है। ये मेरे लिए मुश्किल निर्णय नहीं था। हमें जीवन में ऐसी स्थितियों को स्वीकार करना पड़ता है। मेरी उम्र बढ़ रही थी और मुझे इस बात को खुशी से स्वीकार करना था।”

खुशी-खुशी काम करेंगी एक्ट्रेस: एक्ट्रेस ने कहा कि अमिताभ बच्चन को दूसरी पारी में मौके मिले। वो भाग्यशाली हैं, उनपर भगवान का आशीर्वाद है। लोग वहीं फिल्में बनाते हैं जिनमें अमिताभ मुख्य भूमिका में होते हैं। हमें ऐसे मौके नहीं मिलते। एक्ट्रेस ने कहा,”अगर मुझे ऐसा मौका मिले तो मैं जरूर काम करना चाहूंगी।”

बता दें कि आशा ने अपने पूरे करियर में ‘जब प्यार किसी से होता है’ (1961), ‘तीसरी मंजिल’, ‘दो बदन’ (1966), ‘कटी पतंग’ (1970), ‘कारवां’ (1971), और ‘मैं तुलसी तेरे आंगन की’ (1978) जैसी कई बड़ी फिल्मों में काम किया है। 90 के दशक में आशा ने कम फिल्मों में काम किया। उन्हें ‘प्रोफेसर की पड़ोसन’, ‘भाग्यवान’ (1993), ‘घर की इज्जत’ (1994) और आंदोलन (1995) में देखा गया था।

इसके बाद उन्होंने एक्टिंग छोड़ दी और इसके बाद आशा ने गुजराती सीरियल ज्योति में बतौर टेलीविजन डायरेक्टर काम किया। अपनी प्रोडक्शन कंपनी, आकृति के तहत, आशा ने ‘पलाश के फूल’, ‘बाजे पायल’, ‘कोरा कागज’ और ‘दाल में काला’ जैसे धारावाहिकों का निर्माण किया। 2008 में, वो 9X पर रियलिटी शो त्योहार धमाका में जज भी थीं।

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