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Vodka Diaries Reviews: मनोवैज्ञानिक रोमांच

यह एक मनोवैज्ञानिक थ्रिलर है जिसमें आदमी अपनी पहचान के बारे में भूल जाता है और दूसरे की पहचान अपना लेता है।

यह एक मनोवैज्ञानिक थ्रिलर है जिसमें आदमी अपनी पहचान के बारे में भूल जाता है और दूसरे की पहचान अपना लेता है। अनजाने। मोटे तौर पर कहें तो ऐसा शख्स अपनी कल्पना में जीने लगता है और वास्तविक दुनिया भूल जाता है। केके मेनन ने यहां एक ऐसे शख्स की भूमिका निभाई है जो अपने आपको अश्विनी दीक्षित नाम का पुलिस अधिकारी समझने लगता है जबकि हकीकत में वह एक लेखक होता है। पर एक हादसे के बाद वह अपनी असली पहचान भूल जाता है। वो अपनी पहचान कैसे फिर से पाता है यही फिल्म का आधार है।
इसमें शक नहीं कि फिल्म बहुत अच्छे ढंग से शुरू होती है। सारी घटना मनाली शहर में घटती है। वहां की बर्फबारी और कुदरती खूबसूरती के दृश्य इस मनोवैज्ञानिक थ्रिलर को एक खास तरह की पृष्ठभूमि देते हैं।

कविता और अपराध के बीच भी तुलना की गई है जो फिल्म को एक अलग तरह की गहराई देती है। मंदिरा बेदी ने केके मेनन की पत्नी शिखा की भूमिका निभाई है। शिखा कविताएं लिखती हैं। फिर कुछ समय के बाद शिखा गायब हो जाती है। वह वहां गई? क्या किसी ने उसका अगवा कर लिया।अश्विनी दीक्षित कुछ हत्याओं की तहकीकात कर रहा है। पर क्या वे हत्याएं सच में हुईं या ये सब अश्विनी के मन का भ्रम है? राइमा सेन ने रोशनी बनर्जी नाम के एक रहस्यमय महिला की भूमिका निभाई है। क्या है ये रहस्य, इसका पता तो फिल्म के अंत में चलता है।

फिल्म बॉलीवुड की परिपाटी से अलग राह पर निकलने का प्रयास अवश्य करती है लेकिन दिक्कत ये है कि कहानी में वैसी गहराई नहीं है कि जो आखिर तक ‘आगे क्या होगा’ का रोमांच बनाए रख सके। हालांकि बहुत देर तक ये रोमांच बना रहता है लेकिन अंत में जिस ढंग से रहस्य खुलता है उसमें किसी तरह का चुंबकत्व नहीं है।
यानी अंत में दर्शक को ऐसा महसूस नहीं कराता कि ‘अच्छा ये भी होता है’। हो सकता है कि ‘वोदका डायरीज’ को वोदका पीने के बाद देखें तो कुछ नशा हो, मगर सामान्य दर्शकों के बीच इसके ज्यादा प्रशंसक नहीं होनेवाले हैं-ये तय है।

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