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हमारी याद आएगीः ‘डफली वाले’ की कामयाबी से विश्वनाथ हैरान थे

फिल्मों के गीतकार को न सिर्फ संगीतकार को संतुष्ट करना होता है बल्कि निर्माता-निर्देशकों की पसंद पर भी खरा उतरना पड़ता है। गीतकार आनंद बख्शी के करिअर में कुछ ऐसे भी मौके आए जब इनमें से कोई न कोई उनके लिखे गीत से संतुष्ट नहीं होता था। ऐसा ही वाकया था निर्माता एनएन सिप्पी की फिल्म ‘सरगम’ का। ‘सरगम’ का गाना ‘डफली वाले...’ निर्देशक के विश्वनाथ ने रिजेक्ट कर दिया गया था। और जब इसने बिनाका गीतमाला में नंबर वन पायदान से प्रवेश किया, तो विश्वनाथ हैरान थे और बख्शी मुस्करा रहे थे। 21 जुलाई को आनंद बख्शी की 89वीं जयंती है।

आनंद बख्शी

आनंद बख्शी (21 जुलाई 1930 – 30 मार्च 2002)

दादासाहेब फालके पुरस्कार विजेता तेलुगू फिल्मकार काशीनाथुनी विश्वनाथ (के विश्वनाथ) और उनकी तेलुगू फिल्म ‘सिरी सिरी मुव्वा’ की हीरोइन जया प्रदा ने 1979 की ‘सरगम’ से हिंदी फिल्मों में प्रवेश किया था। इस तेलुगू फिल्म को निर्माता एनएन सिप्पी हिंदी में बना रहे थे। सिप्पी और विश्वनाथ ने इसके संगीत की जिम्मेदारी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और गीत लिखने का काम आनंद बख्शी को सौंपा था। लक्ष्मी-प्यारे और आनंद बख्शी के लिए ‘सरगम’ चुनौती थी। एक तो तेलुगू फिल्मों में के विश्वनाथ का डंका बज रहा था। मानवीय मनोविकारों को बहुत ही गहराई से पकड़ने में माहिर विश्वनाथ को संतुष्ट करना आसान नहीं था। मूल फिल्म देखने के बाद बख्शी ने ‘सरगम’ के लिए सात गाने लिखे। लक्ष्मी-प्यारे एक एक कर इनकी धुनें बना कर के विश्वनाथ को सुनाने लगे।

विश्वनाथ ने सारे गाने तो पास कर दिए लेकिन ‘डफली वाले डफली बजा… को सुनते ही रिजेक्ट कर दिया और कहा कि इसकी जगह पर कोई दूसरा गाना बनाओ। विश्वनाथ के कहने पर लक्ष्मी-प्यारे ने दूसरा गाना बनाया मगर विश्वनाथ ने उसे भी रिजेक्ट कर दिया। इसके बाद बनाए गए गाने भी जब एक के बाद एक रिजेक्ट कर दिए गए तो लक्ष्मी-प्यारे और आनंद बख्शी परेशान हो गए। बख्शी का मानना था कि ‘डफली वाले….’ ही बेहतर गाना है, इसमें लोकप्रिय होने के गुण हैं। उधर विश्वनाथ ने फिल्म के दूसरे गानों का फिल्मांकन भी शुरू कर दिया।

आनंद बख्शी के लिखे सबसे लंबे गाने ‘पर्वत के उस पार…’ ऊटी में फिल्माया गया, तो ‘कोयल बोली…’ राजमुंदरी में गोदावरी के किनारे। इस दौरान लक्ष्मी-प्यारे और आनंद बख्शी ने तय किया कि एक बार फिर से ‘डफली वाले डफली बजा…’ गाना विश्वनाथ को सुना दिया जाए, शायद पसंद आ जाए। दोनों को लग रहा था कि काफी समय बीत गया है, इसलिए हो सकता है कि विश्वनाथ के दिमाग से यह गाना निकल गया होगा।

लिहाजा उन्होंने वापस ‘डफली वाले…’ विश्वनाथ को सुनाया तो विश्वनाथ तुरंत ताड़ गए। कहा, ‘आप फिर से मुझे वही गाना सुना रहे हैं। जबकि मैंने आपको इसकी जगह पर दूसरा गाना बनाने के लिए कहा था।’ चूंकि फिल्म के सारे गाने लिखे जा चुके थे। उनकी धुनें बनाई जा चुकी थी और वे फिल्माए भी जा चुके थे। सिर्फ एक गाने के कारण जब फिल्म के निर्माण में देरी होती नजर आई तो विश्वनाथ ने मजबूरी में ‘डफली वाले…’ का ही फिल्मांकन करना तय किया। कश्मीर में आउटडोर शेड्यूल लगा कर मुगल गार्डन में इस गाने का फिल्मांकन भी कर लिया गया।

आठ जनवरी, 1979 को ‘सरगम’ रिलीज हुई और इसके गानों ने धूम मचा दी। ‘डफली वाले डफली बजा….’ ने बिनाका गीतमाला में पहले पायदान से प्रवेश किया, तो विश्वनाथ लोगों की पसंद से हैरान थे जबकि लक्ष्मी-प्यारे और आनंद बख्शी मुस्करा रहे थे। गाना लगातार 25 हफ्तों तक नंबर एक पर ही बना रहा। फिल्म फेयर पुरस्कारों की पांच श्रेणियों में ‘सरगम’ नामांकित हुई। सर्वश्रेष्ठ फिल्म के अलावा अभिनेता और अभिनेत्री के लिए ऋषि कपूर-जयाप्रदा नामांकित हुए। लक्ष्मी-प्यारे सर्वश्रेष्ठ संगीतकार और जिसे विश्वनाथ ने खारिज कर दिया था उस ‘डफली वाले डफली बजा…’ गाने के लिए आनंद बख्शी सर्वश्रेष्ठ गीतकार के रूप में नामांकित हुए। हालांकि इनमें से सिर्फ लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को सवश्रेष्ठ संगीतकार का फिल्म फेयर पुरस्कार मिला।

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