लड़कों को कुछ अधिकार जन्म के साथ ही मिल जाते हैं या यें कहें कि वो अधिकार उन्हें दे दिए जाते हैं। विद्या बालन की ‘नटखट’ पितृसत्ता, समाज में पुरुषवादी सोच के खिलाफ एक बेहतरीन फिल्म है। बचपन से ही लड़कों को ये कहा जाता है कि ‘कोई बात नहीं जाने दो’, ‘लड़का है गलती हो गई’, ‘ये उसका काम थोड़ी है’, ‘लड़के तो ऐसे ही होते हैं’।
इन बातों का किसी भी लड़के पर क्या प्रभाव पड़ता है, इस फिल्म में वो दिखाया गया है। किसी भी लड़के की जिंदगी में पहली महिला उसकी मां होती है और इसी वजह से उसकी जिम्मेदारी थोड़ी ज्यादा बन जाती है कि वो पुरानी पीढ़ी के मर्दों की सोच से अपनी अगली पीढ़ी को बचा सके।
विद्या बालन की ‘नटखट’ ने पुरुष प्रधान सोच पर उठाए सवाल
33 मिनट की फिल्म ‘नटखट’ में एक 7 साल के बच्चे (सोनू) की कहानी है जिसमें विद्या बालन ने उसकी मां का किरदार निभाया है। फिल्म में पीढ़ियों से चली आ रही है पुरुषवादी सोच से विद्या बालन अपने बेटे को कैसे बचाती है और उसे समानता का गुण सिखाती है, ये फिल्म में दिखाया गया है।
फिल्म नटखट की कहानी
खाने के टेबल पर घर के सभी मर्द खाना खा रहे हैं, दादा, पिता और चाचा एक महिला अधिकारी के बारे में चर्चा चल रही हैं। 7 साल का सोनू इस बातचीत के बीच अपनी हाजिरी देने के लिए सुझाव देता है और अचानक कहता है कि अगर नहीं मान रही हैं तो उठवा दो। यह सुनकर सभी लोग हैरान हो जाते हैं लेकिन उसके दादा वही सदियों पुरानी बात का हवाला देते हुए कहते है- जाने दो लड़का है, कोई बात नहीं।
ये बात भले ही खाने के टेबल से इस तरह नजरअंदाज कर दी जाती है लेकिन सोनू की मां(विद्या बालन) इसे इग्नोर नहीं कर पाती। सोनू रोजाना घर से बाहर देखता था कि कैसे उसकी उम्र से बड़े लड़के लड़कियों को लेकर क्या बातें करते हैं, सीटी बजाने से लेकर गालियां देना उन्हें काफी कूल लगता है। सोनू ये देखकर काफी अट्रैक्ट होता है।
टॉक्सिक मस्क्युलिनिटी के खिलाफ
एक अच्छी परवरिश कैसे आपका जिंदगी को देखने का नजरिया बदल देती है, फिल्म में इसे गहराई से दिखाया गया है। टॉक्सिक मस्क्युलिनिटी, रेप कल्चर, जेंडर इनक्वालिटी, पितृसत्ता और पुरुषवादी सोच के खिलाफ विद्या बालन सोनू को एक कहानी सुनाती है, जिसे सुनकर सोनू सही गलत के फर्क को समझने की तरफ पहल करता है।
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ऑस्कर 2021 में शामिल हुई ‘नटखट’ क्यों है देखने लायक?
शान व्यास के निर्देशन में बनी फिल्म नटखट सिर्फ 33 मिनट की फिल्म है लेकिन एक गहरा मैसेज छोड़ती है। फिल्म में काफी बारीकियों का ख्याल रखा गया है, जिस वजह से ये फिल्म इतनी पावरफुल बन पाई कि ऑस्कर 2021 तक जा पहुंची। यह फिल्म 93वें अकादमी पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ शॉर्ट फिल्म श्रेणी की दौड़ के लिए चुनी गई थी। फिल्म में एक्टिंग के अलावा विद्या बालन इसका सह निर्माता भी हैं। फिल्म को IMDb पर 7.5 रेटिंग मिली है।
फिल्म ये मैसेज देती है कि बच्चों को बचपन से सही और गलत के फर्क को समझाना चाहिए, चाहे लड़का हो या लड़की। साथ ही फिल्म समाज की पिछड़ी सोच पर भी एक तंज कसती है।
