अच्छा लगा, यूपी में बीजेपी ने उर्दू के शब्दों का इस्तेमाल किया; बोले जावेद अख्तर तो यूजर्स ने कहा- भाषा किसी की बपौती नहीं

गीतकार जावेद अख्तर ने बीजेपी सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने बीजेपी के नए नारे में तीन शब्द उर्दू के होने का दावा किया है। इस पर लोगों की ऐसी प्रतिक्रिया आ रही है।

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मशहूर लेखक जावेद अख्तर (फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस)

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ सियासी हलचल भी तेज हो गई है। बीजेपी के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लगातार प्रचार कर रहे हैं। सियासी गलियारों में बीजेपी के मुख्यमंत्री उम्मीदवार को लेकर पहले चर्चा थीं, लेकिन अब साफ हो गया है कि अगर बीजेपी यूपी में जीतती है तो सीएम योगी ही बनेंगे। पिछले दिनों, गृह मंत्री अमित शाह ने अपनी रैली में इसको लेकर साफ भी कर दिया था।

बीजेपी ने योगी सरकार की उपलब्धियों को गिनाने के लिए एक नया नारा दिया है। बीजेपी का ये नया नारा है- ‘सोच ईमानदार, काम दमदार’। पार्टी ने इस नारे से जुड़े होर्डिंग्स को उत्तर प्रदेश में विभिन्न जगहों पर लगाना शुरू कर दिया है। इसमें टीकाकरण, किसानों के फायदे, कानून-व्यवस्था, सरकारी नौकरियां और ऐसे ही अन्य मुद्दों पर ये होर्डिंग तैयार करवाए जा चुके हैं। बीजेपी के इस नए नारे पर गीतकार जावेद अख्तर की प्रतिक्रिया आई है। उन्होंने इसको लेकर एक नया ट्वीट भी किया है।

जावेद अख्तर ने ट्वीट किया, ‘ये देखकर अच्छा लगा कि यूपी में बीजेपी के नए नारे ‘सोच ईमानदार, काम दमदार’ में चार में से तीन शब्द तो उर्दू के इस्तेमाल किए गए हैं। इसमें ईमानदार, काम और दमदार तीन शब्द उर्दू के हैं।’ जावेद अख्तर के इस ट्वीट पर यूजर्स की भी अलग-अलग प्रतिक्रिया आ रही है। राम राजपूत नाम के यूजर ने लिखा, ‘भाषा को राजनीति में मत लेकर आइये। क्योंकि कोई भी भाषा किसी की बपौती नहीं है।’

यूजर सुब्रत ने लिखा, ‘आप ऐसा कैसे कह सकते हैं। पहली बात तो ये है कि आपको उर्दू का संरक्षक किसने नियुक्त किया है?’ प्रमिला नाम की यूजर लिखती हैं, ‘उर्दू शब्द मुगल लेकर आए थे क्या साथ मे? लेकर गए क्यों नहीं फिर?’ यूजर गौरव दीक्षित ने लिखा, ‘आपके ऐसे ट्वीट की वजह से ही आपको कोई गंभीरता से नहीं लेता है। क्योंकि सिर्फ ट्वीट करने से आपको कुछ हासिल नहीं होगा।’ संजू मंजू नाम के यूजर ने लिखा, ‘हमें भी ये देखकर अच्छा लग रहा है कि उर्दू के ज्यादातर शब्द जैसे ईमानदार, काम और दमदार में 3 शब्द तो संस्कृत के ही हैं।’

गोविंद शर्मा नाम के यूजर लिखते हैं, ‘ये सच है क्योंकि ये काफी आकर्षित शब्द भी हैं। जैसे किसी एमबीए के छात्र को ‘जश्न-ए-रिवाज़’ आकर्षित लग सकता है। लेकिन इसे भाषा और राजनीति का रंग देना बिल्कुल गलत है।’

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