आज तक हम इस दुख में हैं कि ‘गजनी’ में कल्पना को अंत तक नहीं पता चल पाता है कि सचिन ही संजय सिंहानिया है।

‘तेरे नाम’ में जब राधे पागलखाने पहुंच जाता है और निर्जरा ज़हर पी लेती है, तो हम अंदर तक दुखी हो जाते हैं।

‘सनम तेरी कसम’ में सरस्वती को मरते देख हम सब आंसू बहाते हैं।

‘सदमा’, ‘रांझणा’, ‘आशिकी 2’ ‘एक विलेन’, ‘लैला मजनूं’, ‘कयामत से कयामत तक’ और ‘मोहब्बतें’ जैसी तमाम फिल्में हैं जिनमें हीरो या हीरोइन या फिर दोनों की मौत हो जाती है, जहां रियल लाइफ में हम सब ‘अंत भला तो सब भला’ की बात करते हैं वहीं रील लाइफ में सैड एंडिंग के बावजूद इन फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन किया।

लेकिन सवाल है: जब इन फिल्मों को देखकर हम अंदर तक दुखी हो जाते हैं, फिर भी ये तमाम फिल्में सैड एंडिंग होने के बाद भी सुपरहिट क्यों हुईं? चलिए समझने की कोशिश करते हैं।

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अधूरी मोहब्बत का आकर्षण (Unattainable Love)

जब कोई प्यार पूरी तरह से पूरा नहीं होता या हमें हासिल नहीं हो पाता, तो हमारा दिमाग उसे खास मानने लगता है। साइक्लॉजी में इसे Idealization of Unattainable Things कहा जाता है।

मतलब, जो चीज़ मुश्किल या नामुमकिन लगती है, हमारा दिमाग उसे ज्यादा परफेक्ट और रोमांटिक मानता है। इसलिए ‘देवदास’, ‘रांझणा’, ‘सनम तेरी कसम’ जैसी अधूरी मोहब्बत की कहानी हमें ज्यादा याद रहती है और दिल को छू जाती है। हमारा subconscious इसे आइडियल मानता है।

जैसा हरिवंश राय बच्चन ने मधुशाला में लिखा:
“प्यार नहीं पा जाने में है, पाने के अरमानों में!
पा जाता तब, हाय, न इतनी प्यारी लगती मधुशाला।”

यानी, हासिल करने में प्यार उतना खास नहीं लगता जितना उसे पाने की तड़प में।

खोने की तड़प (Sense of Loss and Longing)

• हैप्पी एंडिंग वाली फिल्में हम जल्दी भूल जाते हैं, लेकिन दुखभरी कहानियां आज भी हमारे जेहन में रहती हैं।
• हम किरदार की तड़प, खोने का दर्द और अधूरी चाह महसूस करते हैं और उनके साथ खुद को भावनात्मक रूप से जोड़ लेते हैं।
•मनोविज्ञान में इसे एम्पैथी और इमोशनल कनेक्शन बढ़ाने वाला माना जाता है।
• मानव इतिहास में भी, जब इंसान जंगल में रहता था, उसे हर चीज़ पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता था। जो चीज़ मुश्किल से मिलती थी, वह खास लगती थी।

ट्रैजेडी का आकर्षण (Tragic Attraction)

• जब हम सैड कहानी देखते हैं, हमारा मन किरदार के दर्द और संघर्ष से जुड़ जाता है।
• मनोविज्ञान में इसे Catharsis Theory से जोड़ा जाता है। अरस्तू (Aristotle) के अनुसार, ट्रैजेडी देखने से हमारे भीतर दबी हुई भावनाएं रिलीज़ होती हैं।
• Modern studies, जैसे Silvia Knobloch-Westerwick, भी बताती हैं कि दुखद फिल्में हमारी भावनाओं को stimulate करती हैं और हमें गहराई से महसूस कराती हैं।
• इसका सकारात्मक असर यह होता है कि हमारी इमोशनल इंटेलिजेंस और एम्पैथी बढ़ती है।

रिलेटेबल किरदार (Flawed Characters)

• हैप्पी एंडिंग वाली फिल्में हमें अक्सर फिल्मी लगती हैं, लेकिन रियल लाइफ में हर मोहब्बत पूरी नहीं होती।
• ऐसे में जब हम flawed characters देखते हैं- जिनमें इगो, गलती और कमजोरियां होती हैं तो हम उनके इमोशनल स्ट्रगल्स से खुद को रिलेट कर लेते हैं।
• इसलिए रांझणा, आशिकी 2 जैसी फिल्मों में हम ज्यादा इमोशनली इन्वेस्ट हो जाते हैं।

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नॉस्टैल्जिया (Nostalgia)

• अधूरी मोहब्बत की फिल्में हमारे पास्ट रोमांस, पहली मोहब्बत, पहला हार्ट ब्रेक और “क्या होता अगर” वाली यादों को ट्रिगर करती हैं।
• मनोविज्ञान में इसे Nostalgia Theory / Autobiographical Memory कहा जाता है। Sedikides & Wildschut की स्टडीज के अनुसार, नॉस्टैल्जिक कॉन्टेंट हमारे पुराने अनुभवों और भावनाओं को जगाता है।
• इसलिए हम कहानी को सिर्फ स्क्रीन पर नहीं देखते, बल्कि उसे अपने खुद के जीवन से जोड़कर महसूस करते हैं।

पता है कहानी है फिर क्यों फिल्में देखते वक्त रोने लगते हैं हम?

हम जानते हैं कि हम फिल्म देख रहे हैं फिर क्यों हम सैड सीन आने पर रोने लगते हैं, यहां समझिए इसके पीछे की साइक्लॉजी।