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कान फिल्मोत्सव में शामिल भारतीय फिल्मों का सच

प्रथम कान फिल्मोत्सव (1946) में चेतन आनंद की हिंदी फिल्म ‘नीचा नगर’ को सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार मिला था। दूसरी बार 1956 में सत्यजीत राय की ‘पथेर पांचाली’ को यह पुरस्कार मिला।
Author नई दिल्ली | May 13, 2016 11:53 am
प्रथम कान फिल्मोत्सव (1946) में चेतन आनंद की हिंदी फिल्म ‘नीचा नगर’ को सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार मिला था।

कान फिल्मोत्सव के इंटरनेशनल विलेज में भारत सरकार के पैसे से भारतीय वाणिज्य व उद्योग परिसंघ (फिक्की) ने एक पंडाल लगाया है। पिछले कई सालों से यह काम राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम (एनएफडीसी) करता आ रहा था जिसकी अनुमानित लागत केवल बारह करोड़ रुपए बताई जाती है। ऐश्वर्या राय, सोनम कपूर, अनुराग कश्यप, इरफान खान, नवाजुद्दीन सिद्दिकी, अमीशा पटेल सहित कई मुंबइया फिल्मकार इसी पंडाल में आने को कान फिल्मोत्सव में आना मान लेते हैं। उनकी किराए की पब्लिक रिलेशन एजंसियां भारतीय मीडिया में बड़े पैमाने पर इसका प्रचार करती हैं। इससे भारत में यह भ्रम फैलाया जाता है कि कान फिल्मोत्सव ने उन्हें आमंत्रित किया है।

जबकि सच्चाई यह है कि कान फिल्मोत्सव के आफिशियल चयन के साथ विशाल फिल्म बाजार में भी भारत कहीं नहीं है। यह जरूर है कि कई फिल्मकार आठ-दस सीटों वाले छोटे-छोटे थिएटर किराए पर लेकर अपनी फिल्में दिखा रहें हैं। वे भारत के कई शहरों में प्रेस कांफ्रेंस कर बता रहे हैं कि कान में उनकी फिल्म स्वीकृत हो गई है। यही हालत शार्ट फिल्मों की है। यहां कोई भी पैसे देकर अपनी शॉर्ट फिल्म दिखा सकता है और भारत में प्रचार कर सकता है कि उसकी फिल्म कान में दिखाई गई।

बताते हैं कि पेरिस की सौंदर्य प्रसाधन बनाने वाली कंपनी लारिएल कान का लगभग साठ फीसद बजट प्रायोजित करती है।
लॉरिएल ने भारत में अपना बिजनेस बढ़ाने के लिए पहले ऐश्वर्या राय फिर सोनम कपूर को ब्रांड एम्बेसडर बनाया। उनके लिए रेड कारपेट खरीदा और भारत में प्रचारित किया गया कि कान ने उन्हें आमंत्रित किया है। यह भी प्रचार हो रहा है कि कौन कितनी बार कान आ चुका है। अनुराग कश्यप की ‘गैंग्स आॅफ वासेपुर’, ‘अगली’ और ‘साइको रमण’ डाइरेक्टर्स फोर्टनाईट में चुनी गई जिसे फ्रेंच फिल्ममेकर्स एसोशिएशन कान फिल्मोत्सव के मुख्य स्थल से आधा किलोमीटर दूर जे डब्लू मेरियट जैसे पांच सितारा होटल में आयोजित करता है।

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शाजी एन करुण की मलयालम फिल्म ‘स्वाहम’ वह आखिरी फिल्म है जिसे कान फिल्मोत्सव के मुख्य प्रतियोगिता खंड में 1994 में आमंत्रित किया गया था। पिछले बाइस सालों में किसी भी भारतीय फिल्म को कान नें प्रतियोगिता खंड में आमंत्रित नहीं किया है। कान फिल्मोत्सव के 69 साल के इतिहास में मुश्किल से दर्जन भर फिल्मों को आमंत्रित किया गया है। कुछ फिल्में हाल के वर्षों मे अन सर्टेन रिगार्ड, आउट आफ कंपटीशन, स्पेशल स्क्रीनिंग और कान क्लासिक खंडों मे जरूर दिखाई जाती रही हैं। 1913 में कान ने भारत को अतिथि देश का सम्मान जरूर दिया था लेकिन मुख्य खंड में तब भी कोई भारतीय फिल्म नहीं थी।

प्रथम कान फिल्मोत्सव (1946) में चेतन आनंद की हिंदी फिल्म ‘नीचा नगर’ को सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार मिला था। दूसरी बार 1956 में सत्यजीत राय की ‘पथेर पांचाली’ को यह पुरस्कार मिला। कान में मृणाल सेन की फिल्म ‘खारिज’ (1983) को स्पेशल जूरी अवार्ड और मीरा नायर की ‘सलाम बॉम्बे’ (1988) को कैमरा डि ओर तथा आडियंस अवार्ड मिल चुका है। इस समय कान सिनेमा का ओलंपिक बन चुका है। यहां आफिशियल सेलेक्शन में फिल्म के प्रदर्शन का सीधा मतलब है कि उसे अंतरराष्ट्रीय बाजार मिल जाता है। एक साल में बनी दुनिया की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों का पहला प्रदर्शन कान में ही होता है। इसी वजह से दुनिया भर के दिग्गज फिल्मकार कान आना चाहते हैं।

भारत सरकार का भारी भरकम प्रतिनिधिमंडल हर साल कान आता है। इस साल भी केंद्रीय सूचना व प्रसारण राज्यमंत्री के नेतृत्व में एक दल कान आ रहा है। फिर हर साल भारत के अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह गोवा को कान की तरह बनाने के दावे किए जाते हैं। पिछले सोलह सालों से यही हो रहा है। इसे ऐसे समझा जा सकता है कि कान में पिछले साल 32465 डेलिगेट और 4660 फिल्म पत्रकार आए जबकि गोवा में लगभग 12000 डेलिगेट और 400 फिल्म पत्रकार आए। कान का बजट 142 करोड़ रुपए है जबकि गोवा का 12-15 करोड़। कान में दुनियाभर से हर बड़ा फिल्मकार आना चाहता है जबकि गोवा में साधारण फिल्मकार भी नहीं आना चाहता।

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फिल्मकार सुधीर मिश्रा पिछले दस सालों से कान आ रहे हैं। इस बार वे सरकार के प्रतिनिधि हैं। वे कहते हैं कि भारतीय फिल्मकार न तो साहसी हैं न ही हमारे यहां फिल्म बनाने की पूरी आजादी है। हम कई बंधनों को तोड़ नहीं पा रहे हैं। सरकारी नियंत्रण बहुत है। सरकार में सिनेमा की समझवाले लोगों की कद्र नहीं है। सरकारी अफसरों की आपसी राजनीति और अज्ञान कभी भारत को आगे नहीं बढ़ने देता। यहां दुनिया का हर देश अपनी फिल्मों के प्रोमोशन में लगा हुआ है। दुनिया भर से आए मीडियाकर्मियों के पास हर देश की गतिविधियों की जानकारी है। केवल भारत ही ऐसा देश है जिसके बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं है।

यहां आए किसी बड़े फिल्मकार से भारत के बारे में पूछिए तो जवाब मिलेगा-सत्यजीत राय। मतलब यह कि यूरोप के लिए भारतीय सिनेमा पचास साल पहले सत्यजीत राय तक ही ठहरा हुआ है। इसके बाद भी यदि कान फिल्मोत्सव के निदेशक थेरी फ्रेमों को भारत के नए फिल्मकारों से बड़ी उम्मीदें हैं तो इसकी वजह किसी को नहीं मालूम। सचाई तो यहीं है कि कान फिल्मोत्सव में भारतीय फिल्मों के लिए ‘निल बट्टे सन्नाटा’ ही है।

* फिल्मोत्सव के आधिकारिक चयन में भारतीय फिल्में कहीं नहीं
* किराए पर थिएटर लेकर हो रहा फिल्मों का प्रदर्शन
* प्रचार के दम पर कान फिल्मोत्सव में आमंत्रण का दावा

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