कुछ फिल्में सिर्फ कहानी नहीं सुनातीं, बल्कि समाज और देश की वो तस्वीर दिखाती हैं, जिसे देखकर दिल भर आता है। 15 अगस्त 1947 को हमारा देश आजाद तो हो गया था लेकिन ऐसी कई कहानियां और जमीनी बातें थी जिन पर दर्शकों का ध्यान डलवाना जरूरी था।

साल 2004 में निर्देशक आशुतोष गोवारिकर ने अपनी एक फिल्म से उस हकीकत को दिखाने की कोशिश की थी जो शायद आज आजादी के 80 साल बाद भी कहीं ना कहीं वैसी ही है।

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शहरों में भले ही आज आजादी की तस्वीर बदल चुकी हो लेकिन गांवों का देश कहलाए जाने वाले भारत में ग्रामीण जगहों की असलियत बहुत अलग है। जहां आज भी लोगों के संघर्ष, एक बेहतर जिंदगी की उम्मीद और विकास की परिभाषा शहरों से मेल नहीं खाती है।

शहरों और गांवों के लिए आजादी की अलग तस्वीर

2004 में रिलीज हुई शाहरुख खान की ‘स्वदेस’ वो फिल्म थी, जिसने आजाद भारत के गांवों की जमीनी हकीकत, लोगों के संघर्ष और बेहतर जिंदगी की उम्मीद को बेहद गहराई के साथ पर्दे पर उतारा था। वक्त भले ही गुजर गया हो, लेकिन फिल्म की कहानी और भावनाएं आज भी दिल को छू जाती हैं।

नासा का एक वैज्ञानिक मोहन भार्गव (शाहरुख खान) जो बेहद खुशहाल तरीके से अपनी जिंदगी अमेरिका में जी रहा था। अपने बचपन की आया (कावेरी अम्मा) को ढूंढने भारत आता है। भारत आने पर एक छोटे से गांव पहुंचता है, जहां उसे खूबसूरत भारत की एक अलग ही तस्वीर दिखती है लेकिन वो तस्वीर विदेशों में दिखाई और बताई जाने वाली तस्वीर से बेहद अलग होती है।

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‘स्वदेस’ का सबसे मजबूत सीन

अजीते स्टेशन से ट्रेन गुजर रही होती है, जिसमें मोहन बैठा होता है। प्लेटफॉर्म पर ट्रेन रुकती है। एक बच्चा एक हाथ में केतली और दूसरे हाथ में पानी की बाल्टी लेकर चिल्लाता हुआ आता है। ‘पानी ले लो’, ‘पानी’, ’25 पैसे का एक गिलास पानी’। मोहन अपनी सीट की खिड़की पर बैठा ये मंजर देख रहा होता है।

उसे ये महसूस होता है कि छोटा बच्चा जिसके हाथ में इस उम्र में किताबें और कलम होना चाहिए था, उसकी जगह वो हाथों में पानी की बाल्टी लिए पैसा कमाने पर मजबूर है।

एक गिलास पानी की एहमियत

मोहन भार्गव उससे पानी लेता हैं और उस एक गिलास पानी की कीमत और अहमियत का अंदाजा उसे उस दिन होता है। ट्रेन चल पड़ती है और स्टेशन पर खड़ा वो बच्चा 25 पैसे के उन सिक्कों को गिन रहा होता है जो उसने पानी बेचकर कमाए। ये मंजर देखकर माहन की आंखे भर आती हैं क्योंकि उसने अमेरिका में डॉलर में पैसे कमाते हुए 25 पैसे और एक गिलास पानी को कभी उस नजरिए से देखा ही नहीं था।

भारत आने के बाद गांव में मोहन वहां की गरीबी, पानी और बिजली जैसी बुनियादी समस्याओं को देखता है तो उसका जीवन को देखने नजरिया बदल जाता है और इसके बाद वह गांव के विकास में मदद करने का फैसला लेता है।

भारत की आजादी के 80 साल बाद

सोचिए ये सिर्फ एक गांव की कहानी थी, भारत में ऐसे कई गांव हैं जहां आज भी लोग इन सभी बुनियादी चीजों के लिए संघर्ष करते हैं। रेत और मिट्टी की सड़कों को देखकर बड़े हुए लोगों के सामने जब पक्की सड़क का निर्माण होता है तो वो खुशी क्या होती होगी, इसका अंदाजा वही लोग लगा सकते हैं।

ये बातें शहरों में शायद आज बहुत मामूली लगती हों लेकिन आजादी की ये तस्वीर अभी भी कई जगहों पर आनी बाकी है। हमने कई क्षेत्रों में तरक्की करते हुए भले ही कई देशों को पीछे छोड़ दिया लेकिन अपने ही देश के लोगों की बुनियादी जरूरतों पर काम अभी भी जारी है।