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वेब शृंखलाओं में फैल रही है गांव की मिट्टी की महक

इन दिनों यथार्थ से जुड़ी वेब सीरीज में गांव की औरतों सिर पर पल्लू लिए, सूती साड़ी में लिपटी घरेलू औरत के रूप में नजर आ रही है।

आरती सक्सेना

ऐसे समय में जब बालीवुड में पुरुष प्रधान किरदार वाली फिल्मों का बोलबाला पंचायत, मिर्जापूर, ह्यगुल्लकह दर्शकों की पसंदीदा सीरीज ओटीटी की कुछ वेब सीरीज में गांव की मिट्टी की महक फैलती दिख रही है। इसे दर्शक सराह भी रहे हैं जिसके चलते इनके सीक्वल बन रहे हैं। फिर चाहे वह पंचायत हो मिर्जापुर हो, ह्यगुल्लकह हो या आश्रम। इनके संवाद भी लोगों की जुबान पर चढ़े। इन दिनों यथार्थ से जुड़ी वेब सीरीज में गांव की औरतों सिर पर पल्लू लिए, सूती साड़ी में लिपटी घरेलू औरत के रूप में नजर आ रही है। ऐसी औरत, जो पति को ह्यअजी सुनते होह्ण कहती है और बैंक को बंक कहती हैं। यही नहीं वह गाली का इस्तेमाल भी गांव के लहजे में करती है। कुल मिलाकर ओटीटी पर गांव की सीरीज का चलन बढ़ रहा है।

गांव की पृष्ठभूमि पर बनी आगामी वेब सीरीज पंचायत की लोकप्रियता को देखते हुए ह्यपंचायतह्ण का दूसरा भाग पंंचायत 2 दर्शकों के सामने जल्द होगा। इसके अलावा बाबी देओल अभिनीत आश्रम की लोकप्रियता के बाद आश्रम 3 भी रिलीज के लिए तैयार है। वेब सीरीज ह्यमेरे देश की धरतीह्ण की कहानी ऐसे दो लड़कों की कहानी है, जो शहर की जिंदगी से तंग आकर गांव में बसने चले जाते हैं और वहां पर हालात के चलते किसानों की मदद करते हैं। वेब सीरीज माह पंजाब की पृष्ठभूमि पर आधारित है जिसमें दिव्या दत्ता ने 60 साल की औरत की भूमिका निभाई है, जो विपरीत स्थितियों का सामना मजबूती से करती है। इसके अलावा वेब सीरीज ह्यरंगबाजह्ण की कहानी एक गैंगस्टर की कहानी है।

वेब सीरीज गंदी बात के अब तक 6 सीजन आ चुके हैं। अल्ट बालाजी द्वारा निर्मित एकता कपूर की बोल्ड विषय पर बनी इस वेब सीरीज को एक खास वर्ग द्वारा धड़ल्ले से देखता रहा है। वेब सीरीज ह्यआधारह्ण की कहानी गांव में आधार कार्ड पाने के लिए बेकरार लोगों पर है जो आधार कार्ड तो पाना चाहते हैं लेकिन उसके लिए कुछ करना नहीं चाहते।

वेब सीरीज पंचायत बनाने की वजह

पंचायत के निर्देशक दीपक कुमार मिश्रा के अनुसार कहीं न कहीं हम लोगों के दिलों से जुड़ना चाहते थे। ऐसे लोग जो हमारी तरह गांव से प्यार करते हैं। व्यक्तिगत तौर पर मैं गांव का ही रहने वाला हूं। मैं मालगुडी डेज और ब्‍यसेमकेश बख्शी जैसे सीरियल देख कर बड़ा हुआ। जब मैं मुंबई आया और फिल्म थिएटर से जुड़ा, तो कहीं न कहीं मेरे मन में इच्छा थी कि जिस तरह हमने मालगुड़ी डेज जैसे गांव की पृष्ठभूमि पर बने सीरियल का मजा उठाया है, वैसे ही आज की पीढ़ी भी हमारे सीरियल देख कर पुराना स्वाद महसूस करें, जिसके साथ हमने अपना बचपन जिया है। उसे किसी तरह हम अपने जरिए दर्शकों तक लाना चाहते थे। उसी इच्छा के तहत हमने पंचााय बनाया और इस बात की मुझे खुशी है कि दर्शकों के हर वर्ग ने इसे पसंद किया। इसी वजह से पंचायत ह्ण भी बना रहे हैं।

फिल्म वालों का गांव से प्रेम

फिल्म इंडस्ट्री ऐसी जगह है जहां पर हर किसी का स्वागत है। यहां पर न तो जात पात का भेदभाव होता है और न ही अमीर-गरीब का। जिसके पास भी हुनर है वह इंसान फिल्म इंडस्ट्री में जगह बना सकता है। फिर चाहे वह गांव से हो, शहर से हो, या किसी कस्बे से। यहां पर हर किसी का स्वागत है। फिल्म इंडस्ट्री में कई कलाकार ऐसे हैं जो अपने गांव की मिट्टी को छोड़कर मुंबई में एक्टर बनने आए और काफी साल संघर्ष के बाद एक्टर बने। जैसे मनोज बाजपेई, राजपाल यादव, पंकज त्रिपाठी, रघुवीर यादव, नवाजुद्दीन सिद्दकी ऐसे कलाकार हैं जिनको अपनी गांव की पृष्ठभूमि से प्यार है। वे लोकप्रिय हैं और आधुनिक जीवन जीने के बावजूद अपने गांव को नहीं भूले हैं।

पंकज त्रिपाठी के अनुसार जब भी वह गांव पर आधारित वेब सीरीज में काम करते हैं तो उन्हें अपने गांव में बिताए दिन याद आ जाते हैं। इसी तरह रघुवीर यादव कहते हैं,ह्यहमारा बचपन गांव में गुजरा है। गांव में एक पापड़ वाला पापड़ बेचता था। उसके पापड़ बेचने का अंदाज निराला था। उससे भी मैंने बहुत कुछ सीखा और मैं उसी की तरह अलग अलग तरीके से पापड़ बेचने की नकल करता था।

पंकज त्रिपाठी, रघुवीर यादव की तरह मनोज बाजपेई भी मुंबई में बेहतरीन एक्टर के रूप में स्थापित होने के बावजूद अपने गांव को नहीं भूले हैं। मनोज बाजपेई के अनुसार भी जब भी वह कोई वेब सीरीज या गांव पर आधारित फिल्म करते हैं तो उन्हें बहुत अच्छा लगता है। ऐसा लगता है जैसे बचपन की यादें एक बार फिर ताजा हो गई। मनोज बाजपेई के अनुसार उन्हें गांव इसलिए भी अच्छा लगता है क्योंकि वहां कोई दिखावा नहीं होता। प्यार हो या गाली सब कुछ मुंह पर होता है।

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