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वो फ़िल्म जिसके शुरू होने से पहले लोग अपनी चप्पलों को सिनेमाहॉल के बाहर उतार देते थे

मुंबई के बांद्रा में किसी भी तरह की मिथकीय या धार्मिक फ़िल्म नहीं दिखाई जाती है लेकिन उसी बांद्रा में ये फ़िल्म 50 हफ़्तों तक चली थी। वो एक चमत्कार जैसा था।

‘जय संतोषी मां’ ने शोले और दीवार जैसी फिल्मों के स्तर का बिज़नेस किया था।

भारत की आज़ादी से पहले तक मिथकीय और धार्मिक फ़िल्में काफी संख्या में रिलीज़ होती थी। दादा साहब फाल्के की 50 मिनट लंबी फ़िल्म राजा हरीशचंद्र (1913) को इसी कैटेगरी का कहा जा सकता है। लेकिन आज़ादी के बाद ऐसी फ़िल्मों की संख्या में बेहद कमी देखने को मिली। 60 और 70 के दशक में तो ये फ़िल्में बी ग्रेड की श्रेणी में आ चुकी थीं। लेकिन 1975 में रिलीज़ हुई फ़िल्म ‘जय संतोषी मां’ ने कई तरह की भ्रांतियों को तोड़ दिया। ये फिल्म लोअर और लोअर मिडिल क्लास महिलाओं के बीच खासी लोकप्रिय साबित हुई। बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त सफलता पाने वाली फ़िल्मों के साथ इस फ़िल्म का नाम साल की टॉप फ़िल्मों में शुमार हुआ। उस साल जय संतोषी मां को फिल्म ‘दीवार’ और फिल्म ‘शोले’ के स्तर की सफलता हासिल हुई थी।

जय संतोषी मां की सफ़लता को फिर कोई धार्मिक फ़िल्म नहीं दोहरा पाई।

अनीता गुहा वो अदाकारा थीं जिन्होंने संतोषी मां का किरदार निभाया था। उन्होंने कहा – ‘दर्शकों की इस फ़िल्म को लेकर इतनी श्रद्धा थी कि वे लोग स्क्रीन पर फूल, सिक्के और चावल तक फ़ेंक देते थे। कई लोग तो ऐसे थे जो सिनेमाहॉल के बाहर ही चप्पल उतार कर आते थे और हॉल के बाहर ही एक छोटा सा मंदिर भी बना देते थे। मुंबई के बांद्रा में किसी भी तरह की मिथकीय या धार्मिक फ़िल्म नहीं दिखाई जाती है लेकिन उसी बांद्रा में ये फ़िल्म 50 हफ़्तों तक चली थी। वो एक चमत्कार जैसा था।’

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मिथकीय जॉनर को फिर से ज़िंदा करने के अलावा इस फ़िल्म ने संतोषी मां को भी अपने भक्तों के बीच काफी लोकप्रिय किया था। विवादास्पद लेखक वेंडी डोनिगर की किताब में लिखा है कि संतोषी मां का कोई पौराणिक अस्तित्व नहीं है और 60 के दशक में उत्तर प्रदेश की महिलाओं ने संतोषी मां ने पूजना शुरू किया था। संतोषी माता को अक्सर व्रतकथाओं के दौरान उनकी पूजा की जाती है। इस फ़िल्म के शुरूआती सीन में दिखाया गया था कि संतोषी मां, गणेश भगवान की बेटी हैं।फ़िल्म में इस्तेमाल किए गए अनरियलिस्टिक सेट्स और स्पेशल इफेक्ट्स से लोग ऐसे सम्मोहित हुए कि इस फ़िल्म को देखना ही उस दौर में संतोषी मां की पूजा करने के बराबर माना जाने लगा था। जय संतोषी मां की अपार सफलता को देखते हुए कई निर्देशकों ने धार्मिक फ़िल्मों का रूख किया। विजय शर्मा ने 1976 में महालक्ष्मी मां बनाई और 1979 में उन्होंने महासती नैना सुंदरी फिल्म बनाई लेकिन इनमें से कोई भी फिल्म जय संतोषी मां का जादू नहीं दोहरा सकी। यहां तक की रिजनल सिनेमा में भी धार्मिक फ़िल्मों की शुरूआत हुई लेकिन धार्मिक फ़िल्मों में कोई भी फ़िल्म आध्यात्मिक या कमर्शियल तौर पर जय संतोषी मां के स्तर को नहीं छू सकी।


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