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लोकतांत्रिक प्रणाली के पहले पायदान पर पसरी विडंबना

पंचायती राज की त्रिस्तरीय प्रणाली, देश में लागू होने से बरसों पहले भी भारतीय गांवों में चौपाल पर बैठकर गांव के हर तरह के मामलों को पंचों के माध्यम से सुलझाने की सुदीर्घ परंपरा रही है।

राजीव सक्सेना

ओटीटी प्लेटफार्म पर विविधतापूर्ण पटकथा पर आधारित वेब शृंखलाएं देखना सुखद संकेत है। दर्शकों के बदलते रुझान के मद्देनजर लगभग सभी ओटीटी चैनल इन दिनों उन विषयों को लेकर आ रहे हैं जो आम जनमानस को किसी न किसी तरह से अपनी तरफ आकर्षित करते हैं। यानी ज्वलंत मुद्दों को उठा रहे हैं।

पंचायती राज की त्रिस्तरीय प्रणाली, देश में लागू होने से बरसों पहले भी भारतीय गांवों में चौपाल पर बैठकर गांव के हर तरह के मामलों को पंचों के माध्यम से सुलझाने की सुदीर्घ परंपरा रही है। लोकतंत्र के कारण इसी प्रणाली को देश की सबसे निचली न्यायिक शाखा बतौर ग्राम पंचायत, उसके बाद जनपद पंचायत या पंचायत समिति और जिला स्तर पर जिला परिषद के गठन की प्रक्रिया को राष्ट्रीय फलक पर शुरू किया गया। समय के साथ इस व्यवस्था में भी कई सारे बदलाव आए और धीरे-धीरे तमाम अन्य व्यवस्थाओं की तर्ज पर पंचायत प्रणाली भी लगभग मजाक बन कर रह गई।

टीवीएफ के बैनर पर निर्मित वेबसीरीज ‘पंचायत ’ में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले की एक ग्राम पंचायत फुलेरा को काल्पनिक आधार बनाकर रोचक लेकिन संवेदनशील पटकथा का ताना-बाना बुना गया। विगत वर्ष अमेजन प्राइम पर इसके पहले सीजन को दर्शकों की अनपेक्षित सराहना मिली। इससे उत्साहित होकर चैनल ने लम्बे अंतराल के बाद इसके निर्माताओं से सीरीज का दूसरा भाग बनवाया।

पंचायत के प्रथम सीजन में, फुलेरा ग्राम पंचायत के नवनियुक्त सचिव से जुड़ी जिस कहानी को एक खास मोड़ पर छोड़ा गया था। दूसरे भाग में वहीं से इसे आगे बढ़ाया गया। किसी सरकारी विभाग में बड़े अफसर बनने के सपने आंखों में संजोये युवा अभिषेक को, संघर्ष के दौर में ग्राम पंचायत के सचिव का तृतीय श्रेणी का पद भी आकर्षित करता है और वह बिना कुछ आगे-पीछे सोचे यह नियुक्ति स्वीकार करता है। गांव में पैर रखते ही एक नहीं, अनेक तरह की चुनौतियां उसके सामने विशाल आकार लेकर खड़ी हुई होती हैं।

गांव के लोगों के व्यवहार, परंपराओं और परिवेश से लेकर, निचले स्तर की स्थानीय राजनीति और ऊपर के जिला स्तरीय अधिकारियों के दबाव के सेन्डविच बनना उसकी नियति साबित होता है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में वास्तविक धरातल पर पंचायत प्रणाली के लोकतांत्रिक ढांचे की, विगत वर्षों में किस कदर धज्जियां उड़ाई जाती रही हैं, इस शृंखला में इस बात को बेहद बारीक अवलोकन के साथ प्रस्तुत किया गया है। खास कर सरपंच या ग्राम प्रधान अगर महिला है तो उसके स्थान पर पति को तवज्जो दिए जाने के मामले को बखूबी रेखांकित किया गया है।

बलिया, उत्तर प्रदेश की एक ग्राम पंचायत की कहानी, मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के एक गांव में फिल्माई गई, जो दोनों राज्यों में पंचायत प्रणाली के एक सरीखे हालात होने का उदाहरण है। दबंग विधायक का अपना ही अहम और ग्राम प्रधान को वोट बैंक के लिए इस्तेमाल किया जाना, व्यवस्थातंत्र का कड़वा सच उजागर करता है। रंगमंच की पुख्ता बुनियाद वाले अभिनेता रघुवीर यादव के साथ अभिनेत्री नीना गुप्ता और सचिव की भूमिका में जितेंद्र कुमार ने प्रभावित किया। शृंखला के दोनों भाग यूं तो अपनी मौलिकता बनाए रखने में कामयाब रहे लेकिन पहले भाग की अपेक्षा दूसरा भाग, दर्शकों को कहानी के साथ बांध कर नहीं रख पाया।

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