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हिंदू और मुस्लिम का एक गोत्र, वैदिक मंत्रों के साथ मस्जिद की नींव! सेंसर बोर्ड में फंसी ‘द ब्रदरहुड’

सेंसर बोर्ड जहां फिल्म के तीन दृश्यों पर कैंची चलाने का निर्देश दे चुका है, तो वहीं फिल्म निर्माता का कहना है कि यही तीन दृश्य फिल्म की जान हैं।

Author December 19, 2017 2:27 PM
The brotherhood, movie on akhlaq, akhlaq murder movie, bisahada village, The brotherhood censor board, The brotherhood movie posterफिल्म बताती है कि अखलाख हत्याकांड जैसे दुर्भाग्यपूर्ण हादसे से यहां के सामाजिक ताने-बाने पर कोई असर नहीं पड़ा है।

‘न्यूड’ और ‘एस दुर्गा’ जैसी फिल्मों को लेकर पैदा हुए विवाद के बाद अब बिसाहड़ा कांड की पृष्ठभूमि में सांप्रदायिक सद््भाव को प्रोत्साहित करती एक फिल्म ‘द ब्रदरहुड’ भी सेंसर बोर्ड में फंस गई है। सेंसर बोर्ड जहां फिल्म के तीन दृश्यों पर कैंची चलाने का निर्देश दे चुका है, तो वहीं फिल्म निर्माता का कहना है कि यही तीन दृश्य फिल्म की जान हैं। फिल्म यह दिखाने का प्रयास करती है कि ग्रेटर नोएडा के दो गांवों में एक ही गोत्र के लोग रहते हैं जबकि एक गांव के लोग मुसलिम समुदाय से तो एक हिंदू समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। फिल्म बताती है कि अखलाख हत्याकांड जैसे दुर्भाग्यपूर्ण हादसे से यहां के सामाजिक ताने-बाने पर कोई असर नहीं पड़ा है। यहां के लोग इसे राजनीति करार देते हैं।

डाक्यूमेंट्री के निर्माता और पत्रकार पंकज पाराशर ने बताया कि फिल्म के तीन दृश्यों को काटने के सेंसर बोर्ड के निर्देश को हमने सेंसर ट्रिब्यूनल में चुनौती दी है और अब सप्ताह दस दिन में तारीख लगने की संभावना है। हम सारे प्रमाण और तथ्यों से ट्रिब्यूनल को अगवत कराएंगे। पाराशर ने फिल्म की पृष्ठभूमि और विषय वस्तु के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि यह फिल्म बिसाहड़ा गांव में अखलाक हत्याकांड (दादरी लिंचिंग केस) के बाद पैदा हालात से शुरू होती है और ग्रेटर नोएडा क्षेत्र के दो गांवों घोड़ी बछेड़ा और तिल बेगमपुर के ऐतिहासिक रिश्तों को पेश करती है।

वह बताते हैं कि घोड़ी बछेड़ा गांव में भाटी गोत्र वाले हिंदू और तिल बेगमपुर गांव में इसी गोत्र के मुसलिम ठाकुर हैं। लेकिन घोड़ी बछेड़ा गांव के हिंदू तिल बेगमपुर गांव के मुसलमानों को बड़ा भाई मानते हैं। मतलब, एक हिंदू गांव का बड़ा भाई मुसलिम गांव है। पंकज पाराशर ने बताया कि बोर्ड को आपत्ति है कि हिंदुओं और मुसलमानों के गोत्र एक नहीं हो सकते हैं और फिल्म से यह बात हटाइए। दूसरी आपत्ति फिल्म के उस दृश्य को लेकर है जिसमें ग्रेटर नोएडा के खेरली भाव गांव में दो अप्रैल 2016 को एक मसजिद की नींव रखी गई। मंदिर के पंडित ने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ मस्जिद की नींव रखी। कार्यक्रम में सैकड़ों लोग शामिल हुए थे। इस घटना पर मीडिया में खूब समाचार प्रकाशित हुए थे। बोर्ड का कहना है कि इस तथ्य को भी डॉक्यूमेंटरी से हटाया जाए। पाराशर कहते हैं कि सेंसर बोर्ड कुल मिलाकर उन सारी बातों को हटवाना चाहता है जो सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल हैं।

बोर्ड को तीसरी आपत्ति एक इंटरव्यू में भारतीय जनता पार्टी के जिक्र पर है। पंकज पाराशर का कहना है कि भाजपा का जिक्र हटाने से उन्हें कोई समस्या नहीं है। इससे डॉक्यूमेंटरी की मूल भावना प्रभावित नहीं होती है। लेकिन बाकी दोनों कट समझ से परे हैं। उनका कहना है कि सेंसर बोर्ड ने जो कट बताए हैं वो हमें स्वीकार्य नहीं हैं। इस फिल्म के निर्माण की मूल प्रेरणा के बारे में सवाल किए जाने पर उन्होंने बताया कि मूल विषय दादरी में कथित रूप से गौमांस रखने को लेकर मोहम्मद अखलाक की पीट पीट कर हत्या किए जाने की घटना पर आधारित है। डॉक्यूमेंटरी फिल्म ‘द ब्रदरहुड’ का निर्माण ग्रेटर नोएडा प्रेस क्लब के सहयोग से जर्नलिस्ट पंकज पाराशर ने किया है।

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