बॉलीवुड के 100 से ज्यादा साल के इतिहास में जहां हीरो-हीरोइन को सबसे ज्यादा तवज्जो मिलती रही है, वहीं फिल्मों की असली जान कई बार खलनायकों ने डाली है। 70 से 90 के दशक का दौर तो खास तौर पर विलेन का स्वर्णिम काल माना जाता है। रंजीत, डैनी डेंगजोंग्पा, शक्ति कपूर, प्राण, प्रेम चोपड़ा, अमजद खान और अमरीश पुरी जैसे कलाकारों ने अपनी दमदार मौजूदगी से बड़े-बड़े हीरो को टक्कर दी।

इन सबके बीच अगर किसी एक खलनायक का नाम सबसे ज्यादा रौब और लोकप्रियता के साथ लिया जाता है, तो वह हैं अमरीश पुरी। उनकी भारी आवाज, तीखी आंखें और सख्त व्यक्तित्व पर्दे पर ऐसा असर छोड़ते थे कि दर्शक उन्हें देखते ही सिहर उठते थे। ‘मोगैम्बो खुश हुआ’ जैसा डायलॉग आज भी पॉप कल्चर का हिस्सा है।

हीरो से एक रुपया ज्यादा लेते थे फीस

अमरीश पुरी की स्टारडम का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह कई फिल्मों में लीड हीरो से भी ज्यादा फीस लिया करते थे। इस बात का खुलासा अभिनेता सौरभ शुक्ला ने एक इंटरव्यू में किया था।

सौरभ शुक्ला, जिन्होंने उनके साथ फिल्म ‘नायक’ में काम किया था, ने बताया कि सेट पर उन्हें पता चला था कि अमरीश पुरी फिल्म के लीड एक्टर से एक रुपया ज्यादा फीस लेते थे। सौरभ के मुताबिक, “इससे समझ में आता है कि वो कितने बड़े स्टार थे। उनकी डिमांड इतनी थी कि निर्माता उनकी शर्तें मानने को तैयार रहते थे।”

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सादगी भरी जिंदगी, बड़ा सोचने का अंदाज

अक्सर बड़े सितारों के साथ बड़ी टीम चलती है सेक्रेटरी, ड्राइवर और कई असिस्टेंट। लेकिन अमरीश पुरी इससे बिल्कुल अलग थे। सौरभ शुक्ला ने बताया कि उनके पास न कोई सेक्रेटरी थी और न ही ड्राइवर। वह अपनी गाड़ी खुद चलाकर सेट पर आते थे।

जब सौरभ ने उनसे पूछा कि उनके पास स्टाफ क्यों नहीं है, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “मैं पागल हूं क्या? पैसे मैं कमाऊं और बांटता रहूं स्टाफ में!” यह जवाब उनके जमीन से जुड़े और व्यावहारिक स्वभाव को दर्शाता है।

थिएटर से फिल्मों तक का सफर

अमरीश पुरी का जन्म 22 जून 1932 को हुआ था। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत थिएटर से की और लंबे समय तक रंगमंच से जुड़े रहे। बाद में फिल्मों में कदम रखा और धीरे-धीरे हिंदी सिनेमा के सबसे भरोसेमंद और प्रभावशाली खलनायक बन गए।

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उन्होंने सिर्फ हिंदी ही नहीं, बल्कि पंजाबी, कन्नड़ और हॉलीवुड फिल्मों में भी काम किया। फिल्म ‘मिस्टर इंडिया’ में उनका निभाया मोगैम्बो का किरदार आज भी भारतीय सिनेमा के सबसे यादगार विलेन में गिना जाता है।

अमर है उनकी विरासत

12 जनवरी 2005 को अमरीश पुरी इस दुनिया को अलविदा कह गए, लेकिन उनकी आवाज, उनका अभिनय और उनका प्रभाव आज भी जिंदा है। उन्होंने यह साबित कर दिया था कि फिल्म की सफलता सिर्फ हीरो पर नहीं टिकी होती, बल्कि एक मजबूत खलनायक ही कहानी को ऊंचाई देता है।

अमरीश पुरी सिर्फ एक विलेन नहीं थे, बल्कि वह अपने दौर के ऐसे सुपरस्टार थे, जिनकी मौजूदगी भर से फिल्म का स्तर ऊंचा हो जाता था—और यही वजह थी कि वह हीरो से भी एक कदम आगे, एक रुपया ज्यादा खड़े नजर आते थे।