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Bhabhi Ji Ghar Par Hain: पिता चाहते थे डॉक्टर बने ‘विभूति जी’, थियेटर करने लगे तो छोड़ दिया था एकलौते बेटे का साथ; आसिफ़ शेख़ ने बताई कहानी

आसिफ शेख ने जब होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी तो उनके पिता उनसे इतने नाराज़ हुए कि उन्हें Disown कर दिया। उन्होंने करीब 8 - 9 महीने बाद अपने एकलौते बेटे से बात की।

आसिफ शेख के पिता चाहते थे कि वो एक डॉक्टर बने

‘भाभी जी घर पर हैं’ के विभूति नारायण मिश्रा अपने नल्लेपन और अंगूरी भाभी से फ्लर्ट करने वाले किरदार से बहुत लोकप्रिय हुए हैं। विभुति नारायण का किरदार निभाने वाले आसिफ शेख़ ने निजी ज़िंदगी में अपने करियर को लेकर बहुत मुश्किलें झेली हैं। यहां तक कि उनके पिता ने भी कह दिया था कि मैं तुम्हें किसी तरह से सपोर्ट नहीं करूंगा, मैं तुम्हें अस्वीकार करता हूं। उन्होंने अपनी कहानी टेली चक्कर को दिए एक इंटरव्यू में बताई।

आसिफ़ शेख़ ने बताया, ‘मैंने अपने जर्नी की शुरुआत दिल्ली से की। मेरे पिता चाहते थे कि मैं एक डॉक्टर बनूं और उन्होंने अपनी पूरी कोशिश भी की कि मैं डॉक्टर बन जाऊं। लेकिन मैंने होटल मैनेजमेंट में एडमिशन ले लिया। वो इससे बहुत खुश नहीं थे। होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई 8-9 महीने करने के बाद मैंने महसूस किया कि यार मैं तो ज़िन्दगी भर प्लेट ही धोता रहूंगा। ये ठीक नहीं है। मुझे कुछ दिक्कतें भी आईं और मैंने होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई छोड़ दी। इसके बाद मेरे पिता ने मुझे Disown (अस्वीकार) कर दिया। उन्होंने कहा कि घर पर छत है बस बाकी और कोई इमोशनल और फाइनेंशियल सपोर्ट नहीं मिलेगी तुम्हें।’

आसिफ़ शेख़ ने बताया कि जब इसके बाद उन्होंने थियेटर करना शुरू किया तो उनके पिता का गुस्सा सातवें आसमान पर था। उन्होंने बताया, ‘जब मैंने पढ़ाई छोड़ने के बाद थियेटर करना शुरू किया तो वो बहुत अधिक गुस्सा हुए। उनका कहना था कि मेरा एकलौता बेटा ऐसा कैसे कर सकता है। ये तो निकल गया मेरे हाथ से। मैं थियेटर करता रहा दो ढाई सालों तक और उन्होंने मुझसे करीब 8-9 महीने बात नहीं की।’

आसिफ़ शेख़ ने बताया कि उन्हें धारावाहिकों के बाद पहली फिल्म कैसे मिली। वे बोलें, ‘मैंने ‘हमलोग’ की, ‘अजूबे’ की फिर उसके बाद सोचा कि मुझे सिनेमा करना चाहिए। उस वक़्त आपको अपनी पिक्चर्स देनी पड़ती थीं, सीवी का जमाना नहीं था। मैं कुछ लोगों से मिला, और कुछ नहीं हुआ तो वापस दिल्ली चला गया। अचानक मुझे एक दिन कॉल आया ऑडिशन के लिए। मैं मुंबई वापस आया, ऑडिशन हुआ।’

उन्होंने किमी काटकर को फिल्म के लिए पहले ही साइन कर लिया था। उन्होंने किमी से पूछा कि क्या वो मेरे साथ काम करना चाहेंगी। किमी में कहा कि मैं पहले उसे देखना चाहूंगी। मैं सज संवर कर गया उनसे मिलने। उन्होंने कहा कि ठीक है करूंगी इसके साथ काम। इस तरह मुझे पहली फिल्म ‘रामा ओ रामा’ (1988) मिली। इसमें मैंने राज बब्बर और किमी काटकर में साथ काम किया।’

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