जब भारतीय टेलीविजन पर सास-बहू ड्रामों का दौर अपने चरम पर था, तब एक ऐसी महिला किरदार ने दर्शकों का दिल जीत लिया, जो न तो आदर्श बहू थी और न ही किसी बड़ी पारिवारिक कहानी की नायिका। वह थी ‘खिचड़ी’ की हंसा पारेख। अपनी मासूमियत और बेमिसाल कॉमिक टाइमिंग के दम पर हंसा ने ऐसी लोकप्रियता हासिल की कि वह शो की सबसे बड़ी पहचान बन गई। आज, दो दशक बाद भी, यह किरदार उतना ही ताजा लगता है, जितना अपने पहले एपिसोड के समय था।
हंसा का नहीं था आसान किरदार
साल 2002 में जब ‘खिचड़ी’ की शुरुआत हुई, तब भारतीय टेलीविजन पर पारिवारिक ड्रामा का दौर था। ऐसे समय में ‘खिचड़ी’ ने कॉमेडी के जरिए अलग पहचान बनाई। शो का हर सदस्य अपने आप में अनोखा था, लेकिन हंसा पारेख सबसे अलग नजर आई। हंसा की सबसे बड़ी खासियत उसकी मासूम सोच थी।
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वह हर बात को अपने अंदाज में समझती थी और अक्सर उसका मतलब कुछ और निकाल लेती थी। उसकी गलतफहमियां ही शो की सबसे बड़ी ताकत बन गईं। दर्शक जानते थे कि हंसा किसी भी सामान्य बातचीत को असामान्य बना सकती है और यही बात उसे खास बनाती थी।
“प्रफुल्ल…” बना पॉप कल्चर का हिस्सा
अगर हंसा पारेख की बात हो और उसके मशहूर “प्रफुल्ल…” का जिक्र न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। अपने पति प्रफुल्ल को पुकारने का उसका अंदाज इतना लोकप्रिय हुआ कि यह सिर्फ शो का डायलॉग नहीं रहा, बल्कि लोगों की बातचीत का हिस्सा बन गया।
स्कूलों, कॉलेजों और दफ्तरों में लोग मजाक-मजाक में हंसा की नकल करने लगे। सोशल गैदरिंग में उसके डायलॉग दोहराए जाने लगे। उस दौर में सोशल मीडिया नहीं था, लेकिन फिर भी हंसा के डायलॉग लोगों के बीच वायरल होने जैसी लोकप्रियता हासिल कर चुके थे। यह किसी भी टीवी किरदार के लिए बड़ी उपलब्धि थी।
सुप्रिया पाठक की अदाकारी ने किया कमाल
किसी भी यादगार किरदार के पीछे अभिनेता की मेहनत और समझ सबसे बड़ी भूमिका निभाती है। हंसा पारेख को जिस तरह सुप्रिया पाठक ने पर्दे पर जिया, वही उसकी सफलता का सबसे अहम कारण बना। हंसा को निभाते समय उन्होंने कभी किरदार को ओवर-द-टॉप नहीं बनने दिया।
उसकी मासूमियत बनावटी नहीं लगती थी। दर्शकों को लगता था कि वह वास्तव में ऐसी ही है। यही वजह रही कि लोग हंसा पर हंसते जरूर थे, लेकिन उसका मजाक नहीं उड़ाते थे। सुप्रिया पाठक ने अपने चेहरे के हावभाव, आवाज के उतार-चढ़ाव और संवाद बोलने के खास अंदाज से हंसा को एक अलग पहचान दी। आज भी जब लोग इस किरदार को याद करते हैं तो सबसे पहले सुप्रिया पाठक का चेहरा ही सामने आता है।
कॉमेडी जो परिवार के साथ देखी जा सके
‘खिचड़ी’ की सबसे बड़ी ताकत उसकी साफ-सुथरी कॉमेडी थी। उस दौर में भी और आज भी ऐसा कंटेंट बहुत कम देखने को मिलता है जिसे पूरा परिवार एक साथ बैठकर बिना किसी झिझक के देख सके। हंसा पारेख की कॉमेडी कभी किसी का अपमान करके नहीं बनाई गई। उसके डायलॉग, उसकी हरकतें और उसकी सोच दर्शकों को सहज तरीके से हंसाती थीं। यही कारण है कि बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी उससे जुड़ाव महसूस करते थे।
क्यों बन गई कल्ट क्लासिक?
हर लोकप्रिय शो कल्ट क्लासिक नहीं बनता। कल्ट क्लासिक बनने के लिए जरूरी है कि उसकी लोकप्रियता समय के साथ कम होने के बजाय बढ़ती जाए। ‘खिचड़ी’ और हंसा पारेख के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। शो खत्म होने के बाद भी उसके एपिसोड लगातार देखे जाते रहे।
टेलीविजन पर री-रन आते रहे और हर बार नई पीढ़ी के दर्शक उससे जुड़ते गए। इंटरनेट और यूट्यूब के दौर में भी ‘खिचड़ी’ के क्लिप्स लाखों बार देखे गए। हंसा की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज भी किसी व्यक्ति की भोली या मजेदार गलतफहमी की तुलना अक्सर हंसा से की जाती है। यह किसी किरदार के सांस्कृतिक प्रभाव का सबसे बड़ा प्रमाण है।
महिलाओं के कॉमिक किरदारों के लिए बदली सोच
भारतीय टीवी में लंबे समय तक महिला किरदारों को या तो गंभीर भूमिकाओं में दिखाया गया या फिर सहायक कॉमिक किरदारों तक सीमित रखा गया। हंसा पारेख ने इस सोच को बदलने का काम किया। वह शो की ताकत थी।
कई एपिसोड्स में कहानी उसी के इर्द-गिर्द घूमती थी। उसकी मौजूदगी भर से बहुत से सीन मजेदार बन जाते थे। इससे साबित हुआ कि महिला कलाकार भी कॉमेडी शो की सबसे बड़ी यूएसपी बन सकती हैं। आज टीवी और ओटीटी पर दिखाई देने वाले कई महिला कॉमिक किरदारों की सफलता के पीछे कहीं न कहीं हंसा जैसी भूमिकाओं की विरासत भी नजर आती है।
फिल्म और नए सीजन भी नहीं दोहरा पाए जादू
‘खिचड़ी’ की लोकप्रियता को देखते हुए मेकर्स इसका एक और सीजन भी लेकर आए। सिर्फ इतना ही नहीं, इस पर फिल्में भी बनाई गई, लेकिन ओरिजनल शो और खासकर हंसा पारेख के शुरुआती दौर का जादू कुछ अलग ही था। बाद में उसे उसी तरह दोहराना आसान नहीं था।
