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हमारी याद आएगीः न गाने वाला तानसेन

महबूब खान का स्नेह सुरेंद्र पर बरस रहा था। उन्होंने सुरेंद्र को अपनी आठ फिल्मों का हीरो बनाया, जिनमें 1940 की वह ‘औरत’ भी थी, जिसे उन्होंने हूबहू 1957 में ‘मदर इंडिया’ के नाम से बनाया था।

अपनी धुनों पर जमाने को गुनगुनाने पर मजबूर कर देने वाले सुरेंद्र को दो-दो बार फिल्मों में तानसेन की भूमिका करने का मौका मिला मगर दोनों ही बार उनका गाना किसी और ने गाया।

सुरेंद्र    (11 नवंबर 1910- 1987)

नूरजहां और सुरैया के साथ ‘अनमोल घड़ी’ (1946) में काम करने वाले सुरेंद्रनाथ यानी सुरेंद्र वकील थे और गायक भी। महबूब खान उन्हें कुंदनलाल सहगल की टक्कर का गायक बनाना चाहते थे। ‘अनमोल घड़ी’ में नूरजहां-सुरेंद्र का दोगाना ‘आवाज दे कहां है, दुनिया मेरी जवां है…’ खूब लोकप्रिय हुआ। मगर वक्त ने करवट बदली। पार्श्वगायकों की एक नई पीढ़ी फिल्मजगत में आई और देखते-ही-देखते सुरेंद्र की आवाज पार्श्व में चली गई। स्थिति ऐसी आई कि अपनी धुनों पर जमाने को गुनगुनाने पर मजबूर कर देने वाले सुरेंद्र को दो-दो बार फिल्मों में तानसेन की भूमिका करने का मौका मिला मगर दोनों ही बार उनका गाना किसी और ने गाया।

गरीबों का देवदास’ का तमगा मिला था सुरेंद्र को। सागर मूवीटोन के लिए फिल्में निर्देशित कर रहे फिल्मकार महबूब खान की बड़ी इच्छा थी कि जिस तरह कलकत्ता के न्यू थियेटर्स ने केएल सहगल जैसा गायक दिया, उसी तरह मुंबई में वह भी सुरेंद्र को उनकी टक्कर का गायक बनाएं। महबूब ने इसी उम्मीद के साथ सुरेंद्र को 1936 की ‘डेक्कन क्वीन’ में मौका दिया था। इसका गाना ‘बिरहा की आग लगी मोरे मन में….’ भी सुरेंद्र ने सहगल के ‘बालम आय बसो मोरे मन में…’ (देवदास) की तरह गाया था। यह खूब लोकप्रिय हुआ और सुरेंद्र फिल्मों में जम गए।

महबूब खान का स्नेह सुरेंद्र पर बरस रहा था। उन्होंने सुरेंद्र को अपनी आठ फिल्मों का हीरो बनाया, जिनमें 1940 की वह ‘औरत’ भी थी, जिसे उन्होंने हूबहू 1957 में ‘मदर इंडिया’ के नाम से बनाया था। ‘औरत’ में सुरेंद्र ने वही भूमिका की थी, जो ‘मदर इंडिया’ में राजेंद्र कुमार ने निभाई थी। 30 का दशक वह दौर था जब 15-20 दिनों और बीस से पचास हजार रुपए लागत में फिल्में बन रही थीं। इनमें हीरो अपने गाने खुद गा रहा था और साजिंदे ढोलक-पेटी लेकर सेट पर बनी नकली झाड़ियों और पेड़ों के पीछे छुप कर बजा रहे होते थे। फिल्मों में गानों की जरूरत का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि ‘इंद्रसभा’ में 72 गाने थे। ‘देवी देवयानी’ में 70 के आसपास के भगवानदास सिर्फ इसलिए 20 साल की गौहर मामाजीवाला के हीरो बना दिए गए थे क्योंकि वह मशहूर गायक थे। गायकों की फिल्मजगत में खूब मांह थी, लिहाजा जो गायक थे उनके लिए हीरो बनने का सुनहरा मौका था।

महबूब खान ने सुरेंद्र को सहगल बनाने की कोशिश बाद की फिल्मों में भी की। मगर सुरेंद्र को बड़ी प्रतिष्ठा ‘अनमोल घड़ी’ से मिली। विभाजन से पहले कोलकाता, मुंबई, पुणे, लाहौर फिल्म निर्माण के केंद्र थे। विभाजन के बाद लाहौर कट गया जिसका मुंबई फिल्मजगत को सीधा फायदा मिला। देश भर की प्रतिभाओं का रुख मुंबई की ओर होने लगा। सुरेंद्र से अच्छे गायक फिल्मजगत में आने लगे, तो महबूब खान का सुरेंद्र को सहगल बनाने का ख्वाब भी वक्त की गर्द में खो गया।

सुरेंद्र को अभिनेता के रूप में तो काम मिलता रहा मगर गायन धीरे-धीरे हाशिये पर चला गया क्योंकि रफी, मन्नाडे जैसे गायक फिल्मजगत में लोकप्रिय हो रहे थे। सुरेंद्र को 1952 में ‘बैजू बावरा’ में तानसेन की भूमिका निभाने का मौका मिला। फिल्म में बैजू और तानसेन के बीच अपने गाने से पत्थर को पानी बनाने की प्रतियोगिता होती है। नौशाद ने ‘आज गावत मन मेरो झूम के…’ उस्ताद आमिर अली और डीवी पलुस्कर से गवाया और गायक होते हुए भी सुरेंद्र को परदे पर बस होंठ हिलाने पड़े।

सुरेंद्र को दूसरी बार तानसेन बनने का मौका मिला ‘रानी रूपमति’ (57) में। फिल्म में तानसेन बने सुरेंद्र अपने गाने (उड़ जा भंवर माया कमल का आज बंधन तोड़ के) की ताकत के दम पर कमलिनी को खिला देते और उसके अंदर बैठे भंवरे को उड़ा देते हैं। जवाब में रूपमति के गाने ‘आजा भंवर सूनी डगर सूना है घर आजा…’ के दम पर उसी भंवरे को वापस कमलिनी के अंदर बंद कर देती है। इस गाने में भी सुरेंद्र को होंठ ही हिलाने पड़े। यह गाना संगीतकार एसएन त्रिपाठी ने मन्ना डे से गवाया था। इस तरह बदले वक्त और तकनीक के कारण गायक होते हुए भी सुरेंद्र को न गाने वाले तानसेन को परदे पर उतारना पड़ा था।

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