बॉलीवुड एक्टर सनी देओल की फिल्म बंटवारा 1947 हाल ही में 14 अगस्त को रिलीज हुई। फिल्म के रिलीज होने के बाद उसे दर्शकों से मिले जुले रिएक्शन मिले। फिल्म में सनी देओल ने एक मुस्लिम शख्स की भूमिका अदा की है जिसमें भारत-पाकिस्तान के विभाजन के समय उन्हें भारत से पाकिस्तान जाना पड़ता है। इस फिल्म के सामने आने के बाद से मशहूर नाटक लेखक असगर वजाहत और उनका एक प्ले काफी सुर्खियों में आ गया है।

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प्ले का नाम है- ‘जिस लाहौर नई वेख्या, ओ जम्या ए नई’ और इसी प्ले पर आधारित है सनी देओल की फिल्म बंटवारा 1947। इसका हिंदी मतलब है कि जिसने लाहौर नहीं देखा, उसका जन्म ही नहीं हुआ। कमाल बात ये है कि ये प्ले पाकिस्तान में बैन है। फिल्म बंटवारा 1947 के रिलीज के बाद से प्ले के बैन होने पर चर्चा और ज्यादा बढ़ गई है। चलिए इसकी कहानी और इसके बैन होने की वजह पर बात करते है।

कौन हैं असगर वजाहत

प्रसिद्ध हिंदी लेखक और नाटककार असगर वजाहत मूल रूप से भारत में उत्तर प्रदेश के फतेहपुर इलाके के रहने वाले हैं। उनका जन्म 5 जुलाई 1946 में हुआ था। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से हिंदी में एमए और पीएचडी की डिग्री हासिल की। उन्होंने दिल्ली की जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में बतौर हिंदी प्रोफेसर के रूप में काम किया।

असगर वजाहत ने 1989 में एक नाटक लिखा था जिसका नाम “जिस लाहौर नई वेख्या, ओ जम्या ए नई” था। ये नाटक 1947 के भारत-पाकिस्तान के पार्टीशन की पृष्ठभूमि और इंसानियत की गहराई को दिखाता है।

पाकिस्तान में क्यों हुआ बैन

“जिस लाहौर नई वेख्या, ओ जम्या ए नई” ये नाटक पाकिस्तान में बैन है जिसकी वजह इसमें दिखाया गया धार्मिक कट्टरपंथ पर तीखा प्रहार और पार्टीशन के पारंपरिक पाकिस्तानी नैरेटिव को चुनौती देना था। पाकिस्तानी प्रशासन को धार्मिक संस्थाओं और मौलवियों का नकारात्मक चित्रण पसंद नहीं आया।

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नाटक में विभाजन की आपदा के दर्द को एक बेहद मानवीय नजरिए से दिखाया गया है। विभाजन की घटना को इंसानी रिश्तों के नजरिए से गलत और बेहद दर्दनाक बताया है। यह सोच पाकिस्तान की सरकारी विचारधारा से अलग मानी जाती है। ये नाटक न्यूयॉर्क, सिडनी, दुबई और भारत में सैंकड़ों बार पेश किया जा चुका है लेकिन पाकिस्तान में ये बैन है।

क्या है नाटक की कहानी

ये एक काल्पनिक कहानी है। जिसमें सिकंदर मिर्जा और उनका परिवार विभाजन के समय भारत (लखनऊ) से पाकिस्तान के लाहौर में आता है। उन्हें सरकार एक बड़ी हवेली अलॉट करती है।

वहां पहुंचने के बाद उन्हें पता चलता है कि वो हवेली एक अंधी और जिद्दी हिंदू बूढ़ी औरत की है जो पहले से वहां रह रही है और उसने विभाजन के बाद भारत जाने से मना कर दिया था।

सिकंदर मिर्जा का परिवार, समाज और कुछ कंट्टरपंथी लोग उस बूढ़ी औरत पर वो जगह खाली करने के लिए दबाव बनाते हैं। लेकिन समय के साथ सिकंदर मिर्जा का परिवार उस बूढ़ी औरत से नफरत करने के बजाय उससे जुड़ने लगता है और उनके बीच एक मां-बेटे का रिश्ता बन जाता है।

नाटक के अंत में कुछ धार्मिक कट्टरपंथी और असामाजिक तत्व उस बूढ़ी औरत की हत्या कर देते है। फिल्म बंटवारा 1947 में इसी कहानी को दिखाया गया है। फिल्म में सिकंदर मिर्जा का रोल सनी देओल ने प्ले किया है और उस बूढ़ी औरत का किरदार शबाना आजमी ने निभाया है। फिल्म 14 अगस्त को सिनेमाघरों में रिलीज हुई।