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सुब्रत मित्रा: एक नाम जिसने बॉलीवुड ग्लैमर को रोशनी से नया रंग दिया

फिल्मों के कैमरामैनों के लिए रोशनी किसी अनियंत्रित हाथी की तरह होती है, जिसे काबू में करना जरूरी होता है। मुख्यधारा के हिंदी सिनेमा में जब यही रोशनी सिमट कर हीरो-हीरोइन के चेहरे रोशन कर रही थी, तब एक कैमरामैन ने उसे नियंत्रित कर प्राकृतिक रोशनी में तब्दील करना शुरू कर दिया था। यह कैमरामैन थे सुब्रत मित्र, जिन्होंने सत्यजीत राय की अपू त्रयी (पथेर पांचाली, अपराजितो, अपूर संसार) समेत अधिकांश फिल्मों का छायांकन किया और ‘बाउंस लाइटिंग’ के दम पर दृश्यों में वास्तविकता का आभास करवाया।

सुब्रत मित्रा

Bollywood News: कहावत है कि घर का जोगी जोगड़ा, आन गांव का सिद्ध। हॉलीवुड के मोह से मुख्यधारा का हिंदी सिनेमा हमेशा ही प्रभावित रहा। इसके कारण वह अपने यहां की बेहतरीन प्रतिभाओं को तब तक बेजोड़ नहीं मानता, जब तक कि पश्चिम उस पर श्रेष्ठता का ठप्पा नहीं लगा दे। सिनेमेटोग्राफर सुब्रत मित्रा ऐसे ही प्रतिभाशाली छायाकार थे। भारतीय फिल्मों में ‘बाउंस लाइटिंग’ की शुरुआत करने का श्रेय मित्र को जाता है। उन्होंने हिंदी फिल्म ‘तीसरी कसम’ का छायांकन भी किया था। मित्रा ने सत्यजीत राय की फिल्म ‘पथेर पांचाली’ (1955) से बतौर कैमरामैन कैरियर की शुरुआत की। इससे पहले उन्होंने कभी फिल्म का कैमरा नहीं पकड़ा था।

मूक फिल्में प्राकृतिक रोशनी में बनाई जाती थीं, फिर कृत्रिम रोशनी का इस्तेमाल शुरू हुआ। 1956 में बनी राय की ‘अपराजितो’ में पहली बार मित्र ने बाउंस लाइटिंग की शुरुआत की। यह ताकतवर रोशनी को दृश्यों की जरूरत के मुताबिक नियंत्रित करने का हुनर है। इसी कारण ‘अपराजितो’ (1957) आंख को भली लगती है। एक दशक बाद बाउंस लाइटिंग से प्रभावित होकर दुनिया भर के सिनेमा में इसका इस्तेमाल शुरू हुआ माना जाता है।

बाउंस लाइटिंग के सिनेमा पर प्रभाव का उल्लेख निर्देशक गोविंद निहलानी अपने एक साक्षात्कार में करते हैं। निहलानी एटनबरो की ‘गांधी’ के एक कैमरामैन थे। 1980-81 में वह न्यूयार्क के म्यूजियम आॅफ माडर्न आर्ट में लगी भारतीय फिल्मों की प्रदर्शनी में गए थे। वहां उनकी मुलाकात ‘डेज आॅफ हेवन’, ‘क्रेमर वर्सेस क्रेमर’, ‘ब्लू लगून’ जैसी फिल्मों के कैमरामैन रहे नेस्टर अलमांड्रोज से हुई थी, जिन्होंने निहलानी को अपने काम के बारे में बताया।

स्पेन के बार्सिलोना में पैदा हुए नेस्टर 1960 के दशक में पेरिस के एक इंस्टीट्यूट में छायांकन सीख रहे थे। वहां 1964 में बनी भारतीय फिल्म ‘चारुलता’ (1964) दिखाई जा रही थी। फिल्म के दृश्यों की गुणवत्ता इतनी प्रभावशाली थी कि नेस्टर खुद को इसके प्रति मोहित होने से रोक नहीं पाए। उन्होंने तय किया कि वह अपनी फिल्म के दृश्यों की लाइटिंग ऐसे ही करेंगे। उन्होंने अपनी फिल्म के लिए जब ‘चारूलता’ की तरह लाइटिंग करने की कोशिश की, तो उनके मित्रों ने मजाक उड़ाते हुए कहा, ‘शूटिंग के लिए ऐसी लाइटिंग भी कहीं होती है?’ नेस्टर ने उनकी ओर ध्यान नहीं दिया और अपनी धुन में काम करते रहे।

जब उनके मित्रों ने परदे पर नतीजे देखे तो भौंचक्के रह गए, क्योंकि वे बिलकुल अलग और प्रभावशाली थे। यह थी सुब्रत मित्र की तकनीक से ली गई प्रेरणा का कमाल। मित्र तो कृत्रिम रोशनी को प्राकृतिक रोशनी की तरह इस्तेमाल करने का काम 1957 की ‘अपराजिता’ से कर रहे थे। बाउंस लाइटिंग का शोध मजबूरी में हुआ था। ‘अपराजिता’ के लिए बनारस के एक घर का सेट खुले में लगना था। मगर बरसात की आशंका के कारण कला निर्देशक बंसी चंद्रगुप्त ने यह काम कोलकाता के एक स्टूडियो में किया। अब स्टूडियो में खुला आसमान कहां से लाया जाए। तब एक परदे पर नकली आसमान तान उसे रोशन कर दिन की वास्तविक का आभास कराया गया था।

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