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हमारी याद आएगीः बदले से शुरू, बदले पर खत्म हुई एक कहानी

चार साल की उम्र से अभिनय में शुरुआत करने वाली श्रीदेवी ने जहां एक ओर 1983 में ‘हिम्मतवाला’ से हिंदी फिल्मों की दुनिया में हलचल मचा दी थी, वहीं इसी साल ‘सदमा’ में काम कर फिल्म समीक्षकों को अपने दमदार अभिनय से हैरान कर दिया था। मगर वक्त का खेल निराला था कि उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार पाने के लिए 50 साल तक इंतजार करना पड़ा। और जब वह पुरस्कार उन्हें मिला, उसे स्वीकार करने के लिए श्रीदेवी इस दुनिया में नहीं थीं।

श्रीदेवी एकमात्र ऐसी अभिनेत्री थीं जिन्होंने राष्ट्रीय पुरस्कार पाने के लिए 50 साल इंतजार किया।

यह अद्भुत संयोग है कि हिंदी फिल्मों में श्रीदेवी की शुरुआत एक ऐसी फिल्म ‘रानी मेरा नाम’ (1972) से हुई जिसकी नायिका अपने परिवार की मौत का बदला लेती है। श्रीदेवी की आखिरी फिल्म ‘मॉम’ भी बदला लेने की कहानी पर आधारित थी और बतौर नायिका पहली फिल्म ‘मुंदरूमुदिचूू भी बदले की कहानी पर बनी थी। ‘रानी मेरा नाम’ के निर्देशक केएसआर दास थे, जिन्होंने 1970 में तेलुगु फिल्म ‘राउडी रानी’ बनाई थी, जिसे बाद में उन्होंने रानी मेरा नाम से हिंदी में बनाया। इस फिल्म की हीरोइन थी विजयललिता। ‘रानी मेरा नाम’ में वह अपने परिवार को खत्म करने वाले डाकुओं से बदला लेती है। विजयललिता के बचपन की भूमिका श्रीदेवी ने की थी। उनका मात्र तीन मिनट का रोल था, जिसमें उनकी आंखों के सामने पूरे परिवार को डाकू मार डालते हैं। परदे पर श्रीदेवी की आखें ही ज्यादा दिखीं। तब वह मात्र नौ साल की थीं।

यह श्रीदेवी की पहली हिंदी फिल्म थी। यह भी संयोग है कि श्रीदेवी की बतौर हीरोइन पहली फिल्म ‘मुंदरू मुदिचू’ भी बदले की कहानी पर थी। श्रीदेवी कमल हासन से प्यार करती है और रजनीकांत श्रीदेवी से। रजनीकांत को लगता है कि वह दोनों को अलग नहीं कर पाएंगे तो कमल हासन को रास्ते से हटा देते हैं। तब श्रीदेवी रजनीकांत के पिता को अपने रूपजाल में फंसा कर उनसे शादी करती है और रजनीकांत से बदला लेती है। रजनीकांत को इस फिल्म में काम करने से दो हजार रुपए मिले थे और श्रीदेवी को पांच हजार। कमल स्टार थे तो उन्हें मिले थे 30 हजार।

श्रीदेवी की आखिरी फिल्म (अगर ‘जीरो’ को छोड़ दें जिसमें मेहमान कलाकार के रूप में वह श्रीदेवी के रूप में ही दिखीं) ‘मॉम’ थी और यह भी बदले की कहानी पर ही थी। फिल्म में चार लड़के उनकी बेटी से बलात्कार करते हैं मगर कानूनी दांवपेंचों के सहारे बेदाग बरी हो जाते हैं। तब श्रीदेवी एक जासूस की मदद से अपनी बेटी के साथ हुई नाइंसाफी का बदला लेती हैं। हिंदी फिल्मों में बदले से शुरू और बदले पर ही खत्म हुई श्रीदेवी की फिल्मी कहानी।

यह भी श्रीदेवी के साथ नाइंसाफी ही थी कि हरफनमौला कलाकार होने के बावजूद उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार नहीं मिल पाया था। श्रीदेवी ने एक से बढ़कर एक पफॉर्मेंस दिए मगर उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार के काबिल कभी नहीं माना गया। ‘मूंदरम पिराई’ (हिंदी में ‘सदमा’) में उनके काम की तारीफ हुई, राष्ट्रीय पुरस्कार मिला कमल हासन को। हालांकि दक्षिण की दो और अभिनेत्रियां रहीं जिन्हें अपने पूरे कैरियर के दौरान एक बार भी सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार नहीं मिला। एक हैं वैजयंतीमाला और दूसरी हेमा मालिनी।

नरगिस को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार पाने के लिए 32 साल (रात और दिन, 1987) इंतजार करना पड़ा। रेखा ने 24 साल (उमराव जान, 1981) इंतजार किया। वहीदा रहमान (रेशमा और शेरा, 1971) और शर्मिला टैगोर (मौसम, 1975) ने भी 16-16 साल तक इंतजार किया।

मगर श्रीदेवी एकमात्र ऐसी अभिनेत्री थीं जिन्होंने राष्ट्रीय पुरस्कार पाने के लिए 50 साल इंतजार किया। और वह भी उन्हें जीते जी नहीं मिला। 24 फरवरी, 2018 को बाथटब में उनका शव संदेहास्पद स्थितियों में दुबई में मिला था। जबकि 65वें राष्ट्रीय पुरस्कारों की घोषणा 13 अप्रैल 2018 को हुई और वितरित किए गए थे 3 मई, 2018 को।

(13 अगस्त, 1963-24 फरवरी, 2018)

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