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खलनायिकाओं की शान, जिसकी एक कांटे ने ली जान

हिंदी फिल्मों के शुरुआती दौर की खलनायिकाओं में कुलदीप कौर की अपनी शान थी। शादीशुदा कुलदीप और शादीशुदा प्राण लंबे समय तक अच्छे मित्र रहे। विभाजन के दौरान दोनों लाहौर छोड़ मुंबई आए, जहां कुलदीप ने 1948 से लेकर 1960 तक फिल्मों में काम कर अपनी एक अलग जगह बनाई। 1947 के दंगों में प्राण की छूट गई कार को लाहौर से चला कर मुंबई तक पहुंचाया था कुलदीप कौर ने, जिनकी मौत मात्र एक कांटा गड़ने से हुई थी।

हिंदी फिल्मों के शुरुआती दौर की खलनायिकाओं में कुलदीप कौर की अपनी शान थी। शादीशुदा कुलदीप और शादीशुदा प्राण लंबे समय तक अच्छे मित्र रहे।

जब फिल्मों में काम करना ओछी नजरों से देखा जा रहा हो और प्रतिष्ठित घरानों की महिलाएं फिल्मों काम करने को लेकर झिझक रही हों, ऐसी स्थिति में फिल्मों में खलनायिका की भूमिका करने के लिए कौन लड़की तैयारी होगी? शुरुआती दौर में हीरोइन बनने के लिए तो महिलाएं हिम्मत जुटा रही थीं। देविका रानी से लेकर दुर्गा खोटे तक फिल्मों में सक्रिय हो चुकी थीं। मगर खलनायिकाओं का अकाल ही था। ललिता पवार जरूर हीरोइन की भूमिकाएं छोड़ नकारात्मक भूमिकाएं निभा रही थीं, जो उनकी मजबूरी थी। दरअसल उनके चेहरे पर एक फिल्म की शूटिंग के दौरान भगवान दादा का थप्पड़ जोर से पड़ गया था। इसके कारण उनके आधे चेहरे पर लकवा मार गया था और उन्हें हीरोइन की भूमिकाएं मिल नहीं रही थीं। छिटपुट अभिनेत्रियों को छोड़ दें, तो कुल मिला कर खल भूमिकाओं के लिए मैदान खाली था।

इस दौर में नरगिस, नूतन, नसीम बानो से लेकर निम्मी तक और मधुबाला से लेकर मीना शौरी तक के चर्चे थे, लाहौर से आई एक लड़की ने खल भूमिकाओं के खालीपन को भरने की कोशिश की। यह अभिनेत्री फिल्मों की चमक दमक से प्रभावित होकर फिल्मों में आई थी। संपन्न घराने की थी। शादीशुदा थी और उसका ससुराल प्रतिष्ठित था। पति उदार था और चाहता था कि उसकी पत्नी उस अभिजात्य समाज का हिस्सा बने, जिसमें क्लब, जिमखानों और पांच सितारा होटलों में घूमना जिंदगी का हिस्सा थे।

इस लड़की का नाम था कुलदीप कौर। अटारी के एक खातेपीते परिवार में पैदा हुई थी कुलदीप। 14 साल की किशोर उम्र में महाराजा रणजीत सिंह के कमांडर जनरल शाम सिंह अटारीवाला के प्रतिष्ठित परिवार में शादी (पति मोहिंदर सिंह सिद्धू) करने, 16 साल में मां बनने और अभिजात समाज की जीवनशैली अपनाने के बाद कुलदीप कौर की झिझक टूट गई थी और वह ज्यादा बिंदास बन गई थीं। अमृतसर और लाहौर के अभिजात समाज को देखने-समझने के बाद कुलदीप कौर ने फिल्मों में जाने का मन बना लिया था। तब लाहौर में अभिनेता प्राण का हल्ला था। कुलदीप कौर प्राण के अंदाज पर कुर्बान थी और उनके करीब पहुंच चुकी थी। दोनों की पक्की दोस्ती थी, जिसका बयान सआदत हसन मंटो ने अपने अंदाज में किया है। मंटो तब मुंबई में फिल्म लेखन में सक्रिय थे। उन्हीं का लिखा किस्सा मशहूर है कि 1947 में विभाजन के बाद जब कौमी दंगे फैले तो प्राण लाहौर छोड़ मुंबई पहुंच गए। मगर जल्दबाजी में उनकी कार लाहौर में ही रह गई। वहा लाहौर जाकर अपनी कार लाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे। तब दंगों की परवाह किए बिना कुलदीप ने प्राण की कार लाहौर से चला कर मुंबई पहुंचा दी।

मुंबई में कुलदीप कौर का जब बॉम्बे टॉकीज में ऑडीशन लिया तो उनके हीरोइन बनने के अरमानों पर उनके चेहरे से बाहर भागती लंबी नाक और सपाट टुड्ढी ने पानी फेर दिया। हीरोइन की भूमिका में तो वह फिट नहीं हो रही थीं, लिहाजा उन्हें सहायक भूमिकाएं और खल भूमिकाओं के लिए फिट पाया गया। 1948 में उनकी पंजाबी फिल्म ‘चमन’ अच्छी चली। फिर इसी साल आई देव आनंद की हिट फिल्म ‘जिद्दी’ और ‘गृहस्थी’ रिलीज हुई। दोनों में प्राण ने भी काम किया था।

1949 की ‘एक थी लड़की’, 1950 की ‘समाधि’, 1951 की ‘अफसाना’, 1952 की ‘बैजू बावरा’, ‘1953 की अनारकली’ की सफलता ने कुलदीप को सहायक अभिनेत्री के तौर पर ऐसा स्थापित किया कि उन्होंने 100 से ज्यादा फिल्में कीं। 1960 में शिर्डी प्रवास के दौरान उनके पांव में कांटा गड़ा। बिंदास और बेपरवाह कुलदीप ने इसकी परवाह नहीं की और उन्हें सेप्टिक हो गया, जिससे उनकी मौत हुई।

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