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हमारी याद आएगीः जब दो दिग्गजों के अहंकार के बीच फंसे अरमान और अमाल मलिक के दादा सरदार मलिक

'सारगा’ (1961) फिल्म के गाने ‘सारंगा तेरी याद में...’ ने फिल्मजगत में सरदार मलिक को चर्चा का विषय बना दिया था।

संगीतकार सरदार मलिक

सरदार मलिक
13 जनवरी, 1925- 27 जनवरी, 2006
दो ताकतवर लोगों के अहंकार की लड़ाई में एक तटस्थ आदमी किस तरह से पिस जाता है, इसकी मिसाल थे संगीतकार सरदार मलिक, जिनकी शुक्रवार को पुण्यतिथि है। सरदार मलिक उन फिल्म संगीतकारों में से एक थे, जिन्हें बहुत ज्यादा सफलता नहीं मिली। मगर आज भी अगर उन्हें याद दिया जाता है तो वह है उनके द्वारा ‘सारंगा’ फिल्म के लिए बनाया बेमिसाल विरह गीत, ‘सारंगा तेरी याद में नैन हुए बेचैन, मधुर तुम्हारे मिलन बिना दिन कटते नहीं रैन…’

‘सारगा’ (1961) फिल्म के गाने ‘सारंगा तेरी याद में…’ ने फिल्मजगत में सरदार मलिक को चर्चा का विषय बना दिया था। कई फिल्मों के प्रस्ताव उन्हें मिलने लगे थे। मगर उनके एक फिल्म गाने की रिकॉर्डिंग के दौरान एक मशहूर गायिका और ‘लुधियाना के शाइर’ के अहंकार टकरा गए। गायिका चाहती थी कि लुधियाना काशायर अपने लिखे गीत में एक-दो शब्द बदल दे। मगर गीतकार अड़ गया कि यह काम पढ़े-लिखे लोगों को करने दिया जाए। गायिका को गीतकार का यह अंदाज बहुत बुरा लगा। गायिका प्रतिष्ठित थीं। अपने हुनर में माहिर थी और फिल्मजगत में दबदबा था। मगर गीतकार भी ऊंचे दरजे के थे। उनकी कलम का कमाल ऐसा था कि आसानी से उन्हें हाशिये पर नहीं डाला जा सकता था।
इन दोनों ताकतवर लोगों के अहंकार के टकराव में संगीतकार सरदार मलिक तटस्थ रहे। इसका हर्जाना उन्हें अलग तरह से भुगतना पड़ा। कुछ समय बाद जब वे रिकॉर्डिंग स्टूडियो बुक करवाने जाते, तो उन्हें स्टूडियो खाली नहीं मिलते। ऐसा लगातार होने लगा तो सरदार के हाथ से फिल्में निकलने लगीं। मलिक पहले से ही ‘आलसी’ थे, लिहाजा वह फिल्मों से दूर होने लगे।

प्रतिभाशाली मलिक को ‘आलसी की उपाधि’ मशहूर नृत्य निर्देशक उदय शंकर ने दी थी। एक बार उनके अल्मोड़ा स्थित इंडियन कल्चरल सेंटर में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भेंट देने आए थे। उदय शंकर ने मलिक को अनुशासन और समय की कीमत सिखाने के लिए नेहरू को नहलाने के लिए पानी खींचने के काम पर लगा दिया था। खैर, सरदार मलिक को आज की पीढ़ी शायद नहीं जानती हो। संगीतकार अनु मलिक सरदार मलिक के बेटे हैं। सरदार मलिक कपूरथला में 13 जनवरी 1925 को पैदा हुए थे। सात साल की उम्र में पेटी, हारमोनियम, बजाना सीखने के बाद उन्होंने कपूरथला के ढेर सारे लोगों को पांच रुपए महीने फीस पर संगीत सिखाया। फिर घरवालों की मर्जी के खिलाफ मैहर जाकर उस्ताद अलाउद्दीन खान से संगीत सीखा। जब अलमोड़ा में उदय शंकर ने अपना भारतीय संस्कृति केंद्र खोल कर पांच साल का नाट्य, संगीत और नृत्य का पाठ्यक्रम शुरू किया, तो कपूरथला के महाराजा की आर्थिक मदद से मलिक भी उसमें भर्ती हो गए। मशहूर फिल्मकार गुरु दत्त और सरदार अल्मोड़ा में एक ही कमरे में रहते थे। गुरु दत्त किताबी कीड़ा थे। मलिक मनमौजी संगीतकार थे। वे रात-बेरात कभी भी अपना हारमोनियम उठाकर संगीत का रियाज करने लग जाते थे। गुरु दत्त ने उनके लिए जब दस बजे रात की समय सीमा बांध दी और उनकी शिकायत उदय शंकर से कर दी तो खुद उदय शंकर ने आकर गुरु दत्त को समझाया था, ‘रियाज को समय के बंधन में नहीं बांधा जा सकता। मैं खुद कई बार रातों को उठ कर नाचने लगता हूं।’

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पैदा हुई स्थितियों से उदय शंकर का केंद्र बंद हो गया तो गुरु दत्त, सरदार मलिक और मोहन सहगल फिल्मों में नृत्य निर्देशक बनने की तमन्ना लिए मुंबई आए। गुरु दत्त को प्रभात फिल्म कंपनी में नृत्य निर्देशक का काम मिल गया। सरदार को 1947 में ‘रेणुका’ नामक फिल्म में नृत्य निर्देशक के रूप में मौका मिला। मगर कुछ बदलावों के तहत नृत्य निर्देशक के बजाय उन्हें उस फिल्म का संगीतकार बना दिया गया था। सरदार मलिक ने 24 फिल्मों में संगीत दिया। मगर आज भी उन्हें ‘सारंगा’ के गाने ‘सारंगा तेरी याद में…’ के लिए जाना जाता है। यह गाना फिल्म में मुकेश ने भी गाया और रफी ने भी।

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