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हमारी याद आएगीः जब देनी पड़ी हिंदी फिल्मों में प्रवेश के लिए परीक्षा

असम की हरीतिमा लिए चाय बागानों में चहचहाते पक्षियों और चलती मंद हवा के साथ मोजार्ट की सिंफनियों की खुराक पर पले थे संगीतकार सलिल चौधरी। आजादी के आंदोलन से जुड़े रहे सलिल चौधरी के गाने बंगाल में खूब गूंजे। उन्होंने बांग्ला और हिंदी समेत दस भाषाओं की फिल्मों में संगीत दिया। मलयालम फिल्म ‘चेम्मीन’ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार पाया। ‘ऐ मेरे प्यारे वतन...’, ‘मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने चुने...’, ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए...’, ‘सुहाना सफर और ये मौसम हंसी...’ जैसे गाने बनाए। किरदारों की भावनाओं को संगीत के जरिए उभारने में ‘मास्टर’ माने गए सलिल चौधरी की कल 25वीं पुण्यतिथि है।

बिमल राय सलिल चौधरी जैसे नए संगीतकार को मौका देकर कोई जोखिम नहीं उठाना चाहते थे।

मुंबई फिल्मजगत में आसानी से किसी कलाकार को मौका नहीं मिलता। कोई फिल्मकार जल्दी नए कलाकार या अपने जांचे-परखे (कैम्प) नामी लोगों से बाहर के हुनरमंदों पर भरोसा कर जोखिम नहीं लेना चाहता। यही कारण है कि शंकर-जयकिशन से प्रभावित राज कपूर के सामने संगीतकार खय्याम को ‘फिर सुबह होगी’ में संगीत देने के लिए तंबूरा उठा कर परीक्षा देनी पड़ी थी। कुछ ऐसी ही स्थिति सलिल चौधरी के सामने तब आई थी, जब आधा दर्जन बांग्ला फिल्मों में संगीत देने के बाद वह पहली बार हिंदी फिल्मों की दुनिया में प्रवेश करने जा रहे थे। फिल्म थी 1953 में बनी बिमल राय की ‘दो बीघा जमीन’।

‘दो बीघा जमीन’ चौधरी की कहानी ‘रिक्शावाला’ पर बनी थी। कहानी ऐसे किसान की थी जिसे अपनी दो बीघा जमीन बचाने के लिए कलकत्ता जाकर रिक्शा चलाना पड़ता है। कहानी बिमल राय के सहायक हृषिकेश मुखर्जी ने पढ़ी थी। दरअसल इतालवी नव यथार्थवादी फिल्मकार विट्टोरियो डी सिका की ‘बाइसिकल थीव्स’ (1948) से प्रभावित बिमल राय भी वैसी ही किसी कहानी की तलाश में थे। तब हृषिदा ने सलिल चौधरी की कहानी ‘रिक्शावाला’ की सिफारिश की। राय और चौधरी मिले। सब तय होने के बाद जब संगीत देने की बारी आई तो बिमल राय ने कहा कि फिल्म में अनिल बिस्वास का संगीत होगा। अनिल बिस्वास तब स्थापित संगीतकार थे। उनकी फिल्म ‘किस्मत’ (1943) कोलकाता के रॉक्सी सिनेमाघर में 187 हफ्ते चली थी और उसका गाना ‘दूर हटो ए दुनिया वालों हिंदुस्तान हमारा है…’ देश भर में गूंज चुका था। बिमल राय बात सुनकर सलिल चौधरी ने कहा कि इस कहानी पर बनी फिल्म में तो वही संगीत देंगे।

बिमल राय सलिल चौधरी जैसे नए संगीतकार को मौका देकर कोई जोखिम नहीं उठाना चाहते थे। हृषिकेश मुखर्जी ने कहा कि सलिल चौधरी मूलत: लेखक नहीं संगीतकार हैं। मगर राय सुनने को तैयार नहीं थे। आखिर उन्हें यकीन दिलाने के लिए सलिल चौधरी को अपनी हारमोनियम उठा परीक्षा देनी पड़ी। उसके बाद चौधरी ने एक के बाद एक जो धुनें सुनानी शुरू कीं, तो बहुत कम बोलने वाले बिमल राय ने खामोशी से उन्हें संगीतकार के तौर पर स्वीकार कर लिया।

‘दो बीघा जमीन’ के बाद सलिल चौधरी ने बिमल राय की फिल्म ‘मधुमति’ में संगीत दिया और इसके बाद मुंबई फिल्मजगत ने मान लिया कि कोई दमदार संगीतकार आ चुका है। इसके गाने ‘सुहाना सफर और ये मौसम हंसी…’, ‘चढ़ गयो पापी बिछुआ…’, ‘आजा रे परदेसी…’, ‘जुल्मी संग आंख लड़ी…’ खूब हिट हुए।

भारतीय और पश्चिमी संगीत के मेल से तैयार सलिलदा का संगीत इतना भावनाप्रधान और मधुर होता था कि जिन फिल्मों में गानों की गुंजाइश नहीं होती थी, उनके बैकग्राउंड म्यूजिक के लिए उन्हें बुलाया जाता था। मसलन बीआर चोपड़ा की बिना गानों वाली ‘कानून’ (1960), यश चोपड़ा की ‘इत्तफाक’ (1969), गुलजार की ‘अचानक’ (1973) या बासु चटर्जी की ‘कमला की मौत’ (1989) के बैकग्राउंड म्यूजिक के लिए खासतौर पर सलिल चौधरी की मदद ली गई थी।

सलिल चौधरी (19 नवंबर, 1922- 5 सितंबर, 1995)

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