बॉलीवुड की चमक-दमक के पीछे एक ऐसा सच छिपा है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। वो है राइटर्स की मेहनत और उनकी कमाई का असंतुलन। फिल्में हिट हो जाती हैं, लेकिन उसकी कहानी लिखने वाले को क्या फायदा या नुकसान होता है, इसके बारे में आम जनता को पता नहीं चल पाता।
अभिनेता, लेखक और निर्देशक सौरभ शुक्ला ने इसी मुद्दे पर खुलकर बात करते हुए फिल्म इंडस्ट्री के ‘नफा-नुकसान’ का असली गणित सामने रखा। उन्होंने ये भी कहा कि लिखना एक लंबी और कठिन प्रक्रिया है। यह एक खाली कमरे से शुरू होती है और फिल्म के रिलीज होने तक चलती रहती है। इसके अलावा, राइटर्स पैसा नहीं कमाते।
सौरभ शुक्ला का कहना है कि फिल्म की सफलता का सबसे बड़ा आधार उसकी कहानी होती है, लेकिन विडंबना यह है कि उसी कहानी को गढ़ने वाले राइटर को उसका सही हक नहीं मिल पाता। उन्होंने साफ शब्दों में कहा- राइटर को पैसे नहीं मिलते और यह सिर्फ एक शिकायत नहीं, बल्कि इंडस्ट्री के सिस्टम पर सीधा सवाल है।
फिल्म हिट होने का राइटर्स को नहीं होता फायदा
उनके मुताबिक, एक फिल्म में करोड़ों रुपये का बजट होता है, स्टार्स की फीस आसमान छूती है, लेकिन जब बात राइटर की आती है, तो उसे अक्सर सीमित रकम में ही अपना काम पूरा करना पड़ता है। फिल्म हिट हो जाए तो भी उसका फायदा राइटर तक नहीं पहुंचता, और फ्लॉप हो जाए तो जिम्मेदारी कहीं न कहीं उसी पर आ जाती है।
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यही नफा-नुकसान का असली खेल है, जहां जोखिम और मेहनत राइटर की होती है, लेकिन मुनाफा दूसरे हिस्सों में बंट जाता है। सौरभ शुक्ला मानते हैं कि जब तक कहानी लिखने वालों को उनकी मेहनत के अनुसार सम्मान और आर्थिक हिस्सेदारी नहीं मिलेगी, तब तक इंडस्ट्री का यह असंतुलन बना रहेगा।
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दिलचस्प बात यह है कि खुद एक सफल लेखक और अभिनेता होने के बावजूद सौरभ इस मुद्दे को व्यक्तिगत अनुभव से जोड़कर देखते हैं। उनका मानना है कि राइटिंग सिर्फ एक क्रिएटिव प्रोसेस नहीं, बल्कि फिल्म की नींव है और अगर नींव को ही कमजोर रखा जाएगा, तो इमारत कितनी भी चमकदार क्यों न हो, टिकाऊ नहीं हो सकती।
आज जब कंटेंट को ‘किंग’ कहा जा रहा है, ऐसे में सौरभ शुक्ला की यह बात और भी अहम हो जाती है। क्योंकि अगर राइटर को उसका हक नहीं मिला, तो ‘कहानी’ सिर्फ एक शब्द बनकर रह जाएगी उसकी असली ताकत नहीं।
