3 जुलाई 2026 को जब अचानक 4 साल से सेंसर बोर्ड की मंजूरी के लिए लटकी फिल्म ‘पंजाब 95’ को ‘सतलुज’ नाम से रिलीज कर दिया गया, तब दर्शकों तक मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के अलावा एक और किरदार पहुंचा, जिसका नाम था अजीत सिंह संधू जो पर्दे पर एसएसपी सुरजीत सिंह सुग्गा था। ये कहानी पंजाब के साल 1984 से 1995 की पृष्ठभूमि पर आधारित है।
हर कहानी में एक हीरो और एक विलेन होता है। सतलुज में हीरो थे मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा जो उन लावारिस लाशों के पीछे छिपे गहरे सच को ढूंढने में खुद उन लावारिस लाशों का हिस्सा बन गए और फिल्म में विलेन थे एसएसपी सुरजीत सिंह सुग्गा, वर्दी के पीछे छिपा वो खलनायक जिसमें शायद ही दया भाव हो। सवाल ये कि असल जिंदगी का सुरजीत सिंह सुग्गा कौन था। कौन था वो पुलिस वाला जिस पर हजारों पंजाबी युवाओं और जसवंत सिंह खालड़ा के अपहरण और हत्या के आरोप थे।
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फिल्म ‘सतलुज’ में तरनतारन के तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) अजीत सिंह संधू से प्रेरित किरदार को दिखाया गया है। फिल्म में इसी किरदार का नाम सुरजीत सिंह सुग्गा है। फिल्म में इस रोल को सुविंदर विक्की ने प्ले किया है। अजीत सिंह संधू पर मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के अपहरण मामले में मुख्य आरोपी होने के आरोप लगे थे। हालांकि, मुकदमे की सुनवाई पूरी होने से पहले ही उनकी मृत्यु हो गई थी। बाद में खालड़ा अपहरण और हत्या मामले में कई बाकी पुलिस अधिकारियों को दोषी ठहराया गया था।
हजारों लावारिस लाशों के खौफनाक सच
जी5 पर रिलीज होने के 48 घंटों के अंदर ही इस फिल्म को भारत में बैन कर दिया गया लेकिन जिन भी लोगों ने ये फिल्म देखी, उन्होंने पंजाब के उस काले सच को देखा जो उस दौर के लोगों ने असल में जिया था। फिल्म के मुताबिक, जसवंत सिंह खालड़ा अपने एक दोस्त के अचानक गायब हो जाने और उसकी मौत की वजह जानने की कोशिश में उन हजारों लावारिस लाशों के खौफनाक सच तक जा पहुंचते हैं जो सीधा पंजाब सरकार और पंजाब पुलिस की हकीकत तक ले जाता है।
असल जिंदगी का सुरजीत सिंह सुग्गा
सुरजीत सिंह सुग्गा जो असल जिंदगी में अजीत सिंह संधू थे, एनजीओ इंसाफ की रिपोर्ट बताती है कि अजीत सिंह संधू ने भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) नहीं, बल्कि पंजाब पुलिस सेवा (पीपीएस) में शामिल होकर अपना करियर शुरू किया था। उग्रवाद विरोधी अभियान के दौरान भारत सरकार ने कुछ पीपीएस अधिकारियों को खास प्रक्रिया के तहत आईपीएस में प्रमोट कर दिया था, जिससे उन्हें सीनियर कमान पदों पर नियुक्त किया जा सके।
सिर्फ 4 साल में पीपीएस से आईपीएस
पीपीएस अधिकारियों की वरिष्ठता सूची के अनुसार, अजीत सिंह संधू जून 1986 में पीपीएस में शामिल हुए थे और 1 सितंबर 1990 को उन्हें आधिकारिक तौर पर आईपीएस में प्रमोट कर दिया गया था। जिस प्रमोशन के लिए सालों मेहनत करनी पड़ती है, अजीत सिंह संधू को वो पद सिर्फ 4 सालों में मिल गया था। रिपोर्ट्स संधू हजारों लाशों के ढेर से बनी सीढी पर चढ़कर इस प्रमोशन तक पहुंचे थे। उन्हें एक निडर और सख्त पुलिस अधिकारी माना जाता था, लेकिन उनके कार्यकाल पर अपहरण, सबूतों से छेड़छाड़ और कई गैर कानूनी गतिविधियों के आरोप थे।
तरनतारन (उग्रवादियों का गढ़)
द वायर की रिपोर्ट के मुताबिक, 1991 में जब पंजाब के तरनतारन को उग्रवादियों का गढ़ माना जाता था, उस समय अजीत सिंह संधू ने वहां के जिला पुलिस प्रमुख की जिम्मेदारी संभालने की चुनौती स्वीकार की थी। बताया जाता है कि उस दौर में कई अधिकारी, यहां तक कि भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के अधिकारी भी, इस पद को संभालने के लिए आगे नहीं आ रहे थे। उस समय उन्होंने इस चुनौती को पूरा करने के लिए हर वो काम किया जो कुछ सही गलत नहीं देखा।
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जसवंत सिंह खालड़ा का अपहरण
अजीत सिंह संधू के काले कारनामों को उजागर करने वाले जसवंत सिंह खालड़ा थे। बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, एसएसपी अजीत सिंह संधू ने दोषियों और कुछ बाकी पुलिस कर्मियों के साथ मिलकर जसवंत सिंह खालड़ा को अगवा करने और उन्हें खत्म करने या खतरे में डालने की साजिश रची थी। सीबीआई की रिपोर्ट के मुताबिक पुलिस अधिकारियों ने 6 सितंबर 1995 को उन्हें उनके आवास से ही अगवा कर लिया था।
अजीत सिंह संधू ने की आत्महत्या
रिपोर्ट्स के मुताबिक, अजीत सिंह संधू ने 23 मई 1997 को पैरोल पर जेल से बाहर रहने के दौरान कथित तौर पर आत्महत्या कर ली थी। उनकी लाश एक रेलवे ट्रैक पर मिली थी, जिसके हाथ में एक नोट पर लिखा था कि “अपमान के साथ जीने से बेहतर है मर जाना।”। द वायर में बताया गया है कि भारत सरकार ने उन्हें दो बार राष्ट्रपति वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया था। वहीं, उनकी मृत्यु के समय उनके खिलाफ करीब 16 कानूनी मामले लंबित थे।
फिल्म ‘सतलुज’
फिल्म में इस किरदार का नाम एसएसपी सुरजीत सिंह सुग्गा है जो सबसे खूंखार, खौफनाक और निर्दयी पुलिसवाला था। फिल्म के मुताबिक, ये वो समय था जब आतंकवादी को मारने के बदले पंजाब में पुलिस वालों को प्रमोशन मिलता था और इसी लालच में बेकसूरों को आतंकवादी बताकर मारा जा रहा था, इतना ही नहीं पुलिसवालें उनको लावारिस बता कर उनका अंतिम संस्कार भी कर देते थे।
इन लोगों के नाम पता, ना तो पुलिस स्टेशनों की एफआईआर में था, ना अस्पतालों में और ना ही शव ग्रहों में लेकिन श्मशान घाट में जरूर होता था क्योंकि बिना नाम बताए जलाने को लकड़ियां नहीं मिलती थी। इन्हीं श्मशान घाटों के रजिस्टरों में मौजूद नामों के जरिए जसवंत सिंह खालड़ा एक लंबी लिस्ट तक पहुंचे, जिसकी गिनती हजारों तक पहुंचती थी। फिल्म में जसवंत सिंह खालड़ा का किरदार सिंगर और एक्टर दिलजीत दोसांझ ने निभाया है, फिल्म का निर्देशन हनी त्रेहान ने किया है।
