हनी त्रेहान के निर्देशन में बनी फिल्म ‘सतलुज’ 3 जुलाई को ओटीटी प्लेटफॉम जी5 पर स्ट्रीम हुई थी और 5 जुलाई को इसे भारत सरकार के निर्दशों के बाद देश में बैन कर दिया गया। डिजिटल प्लेटफॉर्म से बिना कारण बताए फिल्म हटा दी गई, जिसके बाद विवाद खड़ा हो गया। कई लोगों ने सोशल मीडिया पर दिलजीत और फिल्ममेकर्स का समर्थन किया और सरकार की आलोचना की। इसके बाद अब सरकार ने इसे लेकर एक नया कदम उठाया है।
एएनआई के अनुसार, सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने सोमवार को दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ के कंटेंट की जांच के लिए एक हाई-लेवल इंटर-डिपार्टमेंटल कमेटी बनाई है। बता दें कि यह फिल्म पंजाब के एक मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के गायब होने की घटना से प्रेरित है।
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राम गोपाल वर्मा ने किया फिल्म का समर्थन
फिल्म ओटीटी से हटने के बावजूद इसकी पायरेटेड कॉपियां इंटरनेट पर तेजी से वायरल हो रही हैं। कई दर्शकों ने इसे इस साल की बेहतरीन फिल्मों में से एक बताया। फिल्म को हटाए जाने के बाद फिल्म इंडस्ट्री और अन्य क्षेत्रों से कई लोग इसके समर्थन में सामने आए हैं। फिल्ममेकर राम गोपाल वर्मा ने भी सोशल मीडिया हैंडल एक्स पर एक लंबा चौड़ा नोट शेयर किया है।
राम गोपाल वर्मा ने लिखा, “अभी ‘सतलुज’ देखी और यह सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि गहरा जख्म है, जो कभी नहीं भरेगा। यह हमारी इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में से एक की याद दिलाती है। फिल्म में दिलजीत दोसांझ ने बहुत शांत लेकिन असरदार अभिनय किया है। उनके किरदार के पास सिर्फ एक रजिस्टर और अपनी अंतरात्मा की आवाज है। वहीं अर्जुन रामपाल ने सिस्टम के अंदर मौजूद सड़न और मिलीभगत को बेहद वास्तविक तरीके से दिखाया है।”
फिल्ममेकर ने आगे लिखा, “डायरेक्टर हनी त्रेहान ने हॉरर को सनसनीखेज बनाने के बजाय, फिल्म को सरकारी फाइलों, दाह-संस्कार के रिकॉर्ड और दबी-छुपी बातचीत के जरिए एक धीमी गति वाली इन्वेस्टिगेटिव थ्रिलर की तरह पेश किया है। यह संयम फिल्म के विषय की क्रूरता को और भी ज्यादा असरदार बनाता है, क्योंकि यह सच्चाई की ताकत के साथ सामने आती है, न कि सनसनी या शोषण के जरिए।”
राम गोपाल ने किया ‘सतलुज’ देखने का समर्थन
राम ने आगे लिखा, “फिल्म का सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब एक लोकतंत्र अपने ही नागरिकों के साथ अन्याय करता है, तो क्या वह उसके सबूत भी मिटाने की कोशिश करता है? इस गंभीर विषय को बिना भाषण दिए और बिना उपदेशात्मक हुए दिखाना आसान नहीं था।
फिल्म को लेकर जो विवाद और रुकावटें सामने आई हैं, वे भी यही साबित करती हैं कि जो कला ताकतवर लोगों को असहज कर दे, उसने अपना काम कर दिया। सच्ची कला का मकसद भी यही होता है और ‘सतलुज’ वही करती है।
यह एक साहसी और जरूरी फिल्म है, क्योंकि यह बेचैन करती है, जानकारी देती है और देखने के बाद लंबे समय तक दिमाग में बनी रहती है। ऐसे दौर में जब मुख्यधारा का सिनेमा सिर्फ तमाशे और मनोरंजन के पीछे भाग रहा है, ‘सतलुज’ याद दिलाती है कि सिनेमा सच और ईमानदारी के साथ कितना बड़ा असर पैदा कर सकता है।
‘सतलुज’ ऐसी फिल्म है जिसे देखा जाना चाहिए, दिखाया जाना चाहिए, उस पर चर्चा होनी चाहिए और बहस होनी चाहिए। इसके साथ वही नहीं होना चाहिए जो फिल्म में दिखाए गए लोगों के साथ हुआ था। मेरी सभी जिम्मेदार लोगों से अपील है कि ‘सतलुज’ के साथ वह मत कीजिए जो जसवंत सिंह कालरा के साथ हुआ था। सच को छिपाने की कोशिश की जाए, तो वह और ज्यादा ताकत के साथ सामने आता है।”
कौन थे जसवंत खालड़ा
‘सतलुज’ की कहानी जसवंत खालड़ा के जीवन से प्रेरित है। खालड़ा का 1995 में उनके घर से अपहरण कर लिया गया था। इसके बाद वह कभी नहीं लौटे। अदालत में सीबीआई की तरफ से दी गई जानकारी के मुताबिक, जसवंत सिंह मानवाधिकार कार्यकर्ता थे और शिरोमणि अकाली दल के मानवाधिकार प्रकोष्ठ के महासचिव रह चुके थे।
1980 और 1990 के दशक में पंजाब में चरपमंथ के साथ-साथ पुलिस अत्याचार, हिरासत में मौतों और कथित फर्जी पुलिस मुठभेड़ों की घटनाओं को लेकर चर्चा में रहा। ऐसा बताया जाता है कि खालड़ा ने जून 1984 से दिसंबर 1994 के बीच अमृतसर, मजीठा और तरनतारन के तीन श्मशान घाटों में मिले अज्ञात शवों का ब्योरा सार्वजनिक किया था।
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