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जेल से रिहा संजय बोले, मैं आतंकवादी नहीं हूं

बॉलीवुड अभिनेता संजय दत्त को एके-56 राइफल रखने और फिर उसे नष्ट करने के कारण 19 अप्रैल, 1993 को गिरफ्तार किया गया था।

Author पुणे | February 26, 2016 2:24 AM
संजय दत्त जेल से बाहर आते हुए। (पीटीआई फोटो)

बॉलीवुड अभिनेता संजय दत्त पांच साल की सजा में कुछ छूट मिल जाने के बाद गुरुवार को यरवदा जेल से बाहर आए। इसके साथ ही वह वर्ष 1993 में मुंबई में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के दोषी के तौर पर अपने विवादास्पद अतीत को पीछे छोड़ आए हैं। उन्होंने जेल से बाहर आकर कहा,‘मैं आतंकवादी नहीं हूं’।

नीली कमीज और जींस पहनकर मुस्कुराते हुए दत्त को औपचारिकताएं पूरी करने के बाद गुरुवार सुबह जेल से बाहर लाया गया। रुपहले पर्दे के ‘मुन्नाभाई’ ने जेल के बाहर इंतजार कर रही कार में बैठने से पहले मिट्टी को नमन किया। फिर जेल के शीर्ष पर फहर रहे तिरंगे को सलाम किया। अपने साथ वह अपने सामान का बैग और अपनी फाइल लेकर निकले थे। वह एक कार में बैठे, जिसे चला कर वह सीधे लोहेगांव हवाई अड्डे चले गए जहां उन्हें मुंबई जाने के लिए चार्टेड विमान पकड़ना था। संजय की पत्नी मान्यता और जाने-माने फिल्मकार राजकुमार हिरानी शहर के हवाई अड्डे तक उनके साथ गए।

संजय दत्त ने पांच साल की सजा की शेष अवधि के तौर पर यरवदा जेल में 42 माह बिताए। जल्दी-जल्दी पैरोल और छुट्टी मिलते रहने के कारण उनकी जेल की सजा विवादों में घिरी रही। आलोचकों का कहना था कि उन्हें यह विशेष सुविधा उनके सेलेब्रिटी होने के कारण दी जा रही है। जेल प्रशासन और उनके वकीलों ने इन आरोपों से यह कह कर इनकार कर दिया कि 144 दिनों की छूट और उनकी पैरोल वाली छुट्टी जेल के नियमों और नियम पुस्तिका के अनुरूप है।

बॉलीवुड अभिनेता संजय दत्त को एके-56 राइफल रखने और फिर उसे नष्ट करने के कारण 19 अप्रैल, 1993 को गिरफ्तार किया गया था। यह राइफल उन हथियारों और विस्फोटकों के जखीरे का हिस्सा थी, जो मार्च 1993 के शृंखलाबद्ध विस्फोटों से पहले भारत में आया था। जांच और लंबे समय तक चली सुनवाई के दौरान संजय ने 18 माह जेल में बिताए। 31 जुलाई, 2007 को मुंबई की टाडा अदालत ने उन्हें आर्म्स एक्ट के तहत छह साल की सश्रम कारावास की सजा सुनाई। इसके साथ ही अदालत ने उन पर 25 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया।

वर्ष 2013 में उच्चतम न्यायालय ने फैसले को तो बरकरार रखा लेकिन सजा को घटा कर पांच साल का कर दिया। इसके बाद संजय ने अपनी बाकी की सजा काटने के लिए आत्मसमर्पण कर दिया। जेल के अधिकारियों के अनुसार संजय को उनकी प्रकोष्ठ में कागज के लिफाफे बनाने का काम दिया गया था। संजय ने इंटरनल सर्किट जेल रेडियो के कार्यक्रमों में नियमित तौर पर भागीदारी की। कैद के दौरान उन्हें दिसंबर, 2013 में 90 दिन की पैरोल दी गई। बाद में फिर 30 दिन की पैरोल मिली।

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