अकसर कहा जाता है कि बदलते दौर के साथ प्यार की परिभाषा भी बदलती जा रही है। ऐसा रियल लाइफ में नहीं बल्कि फिल्मों में भी देखने को मिल रहा है। आजकल की फिल्मों में प्यार के लिए हीरो जुनूनी बन जाते हैं और खूब खून खराबा करते पर उतारे रहते हैं। मगर पहले कुछ ऐसी प्रेम कहानियां बड़े पर्दे पर दिखाई गई थीं, जिनमें प्यार बेहद मासूम और बिना किसी स्वार्थ के दिखाया जाता था। आज सिने गुफ्तगू में हम आपको एक ऐसी फिल्म के बारे में बताने जा रहे हैं जिसकी प्रेम कहानी ने कई लोगों के दिल को छुआ।
हम बात कर रहे हैं 8 जुलाई 1983 को आई फिल्म ‘सदमा’ की, जिसमें दिवंगत एक्ट्रेस श्रीदेवी और कमल हासन ने अहम किरदार निभाया था। फिल्म को बालू महेंद्र ने लिखा था और उन्होंने ही इसका निर्देशन भी किया था। फिल्म में कई बेहतरीन डायलॉग्स थे जिन्हें प्रसिद्ध लेखक गुलज़ार ने लिखा था। ये फिल्म बालू महेंद्र द्वारा निर्देशित, उनकी अपनी अपनी तमिल फिल्म ‘मून्द्रम पिरई’ का हिंदी वर्जन है, जिसने दो राष्ट्रीय पुरस्कार जीते। फिल्म के लिए कमल हासन को बेस्ट एक्टर, बालू महेंद्र को बेस्ट सिनेमेटोग्राफी के लिए अवॉर्ड मिला था। तमिलनाडु में भी इसे 5 राज्य फिल्म पुरस्कार मिले थे। श्रीदेवी ने भी फिल्म के लिए बेस्ट एक्ट्रेस का अवॉर्ड जीता था।
प्यार, जो किसी रिश्ते के नाम का मोहताज नहीं
इस फिल्म में ऐसा प्यार दिखाया गया है जो एकतरफा है और उसे किसी पहचान की जरूरत नहीं। ऐसा निस्वार्थ प्रेम शायद ही अब देखने को मिलता है। यह एक प्यारी, नादान इश्क की कहानी है, जिसे देखकर शायद ही कोई अपनी आंखों के आंसुओं को रोक पाए। खासकर आखिरी के कुछ सीन, जो शायद हिंदी सिनेमा के सबसे इमोशनल सीन हैं।
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मासूम है ये इश्क
फिल्म की कहानी नेहलता के इर्द-गिर्द घूमती है और इस किरदार को श्रीदेवी ने निभाया है। नेहलता जो एक सड़क दुर्घटना के बाद मानसिक रूप से कमजोर हो जाती है और एक छोटी बच्ची की तरह बर्ताव करने लगती है। उसकी जिंदगी में सोमनाथ एक फरिश्ता बनकर आता है और ये अहम किरदार कमल हासन ने निभाया है। वैसे तो सोमनाथ पेशे से एक स्कूल टीचर है, लेकिन नेहालता की मासूमियत और बेबसी को समझते हुए उसकी दिनरात देखभाल करने लगता है। समय के साथ दोनों के बीच एक गहरा इमोशनल रिश्ता बन जाता है, जो प्रेम, दर्द और जिम्मेदारी से बुना हुआ है। लेकिन कहानी एक ऐसे मोड़ पर पहुंचती है, जहां हालात उन्हें अलग कर देते हैं और फिल्म का अंत दर्शकों को अंदर तक झकझोर कर रख देता है। जो एक बचकानी नेहलता का हर पल साथ दे रहा था आखिर में वो ही उसे बचकाना लगने लगता है।
कैसे बदलती है नेहलता की जिंदगी
नेहलता अपने दोस्तों के साथ बीच से लौटते वक्त एक कार हादसे का शिकार हो जाती है। होश में आने के बाद वह अपने माता-पिता तक को पहचान नहीं पाती। डॉक्टर बताते हैं कि गहरे सदमे की वजह से उसकी याददाश्त चली गई। नेहलता शारीरिक रूप से भले ही एक वयस्क महिला है, लेकिन मानसिक रूप से वह छह-सात साल की बच्ची बन जाती है, जिसकी यादें वहीं तक सीमित हैं।
इलाज के दौरान उसका अपहरण कर लिया जाता है और उसे एक कोठे में बेच दिया जाता है, जहां उसका नाम बदलकर रेशमी रख दिया जाता है। उसी कोठे में उसकी मुलाकात सोमू यानी सोमनाथ से होती है, जिसे उसका दोस्त जबरदस्ती वहां ले आता है। लेकिन सोमू को यह माहौल बिल्कुल रास नहीं आता और जब उसे एहसास होता है कि रेशमी असल में मानसिक रूप से एक बच्ची है और पूरी तरह असहाय है, तो वह भीतर से टूट जाता है।
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रेशमी की बातों से सोमू समझ जाता है कि उसे जबरदस्ती यहां लाया गया है। वह किसी भी कीमत पर उसे वहां से निकालना चाहता है। वह एक दिन के लिए उसे बाहर ले जाने की इजाजत लेता है, लेकिन वापस लौटने के बजाय उसे ट्रेन में बैठाकर रामनगर की पहाड़ियों में अपने घर ले जाता है। यहीं वो उसकी देखभाल करता है और उसे पूरी तरह ठीक करता है। इसके बदले वो कुछ नहीं चाहता, लेकिन जब दोनों अलग होते हैं तो वो टूट जाता है।
इस फिल्म की खासियत
इस फिल्म की कहानी, सीन, एक्टर्स, डायलॉग के साथ-साथ इसका म्यूजिक भी बड़ी ताकत रहा है। इलैयाराजा की यादगार धुनें, जिनमें ए.आर. रहमान का भी बड़ा सहयोग रहा। आशा भोसले, सुरेश वाडकर तथा के.जे. येसुदास की आवाजों ने इसे और भी खास बना दिया।
