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जब पसंद आया साधना का चूड़ीदार

साधना ने बीआर चोपड़ा की मल्टीस्टारर फिल्म ‘वक्त’ (1965) में जो चूड़ीदार सलवार-कमीज पहना था और ‘लव इन शिमला’ में जिस तरह की हेअर स्टाइल रखी थी, उनकी खूब नकल हुई।
साधना ने बीआर चोपड़ा की मल्टीस्टारर फिल्म ‘वक्त’ (1965) में जो चूड़ीदार सलवार-कमीज पहना था और ‘लव इन शिमला’ में जिस तरह की हेअर स्टाइल रखी थी, उनकी खूब नकल हुई।

हर दौर में सिनेमा ने समाज से और समाज ने सिनेमा से रस खींचा है। सिनेमा कहानियों और किरदारों के लिए समाज की ओर देखता है, तो लोग फिल्मों में अपनी पसंद-नापसंद ढूंढ़ते रहते हैं। समाज में चर्चित घटनाओं पर फिल्में बनती हैं और लोकप्रिय कलाकारों की वेशभूषा से लेकर केश शैली तक की नकल की जाती है। राजेश खन्ना का गुरु कुरता, साधना की हेअर स्टाइल, अमिताभ बच्चन की फ्रेंच कट और आमिर खान की मक्खी कट दाढ़ी जमाने का फैशन बन जाती है।
60 के दशक की फिल्मों में ग्लैमर और फैशन को जिस अभिनेत्री ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया, वह थीं साधना शिवदासानी। कराची में पैदा हुई साधना विभाजन के कारण परिवार समेत यहां आईं और तीन साल तक परिवार के साथ शरणार्थी शिविरों में रहीं। उन्होंने ‘श्री 420’ (1955) में एक्स्ट्रा की भूमिका की। बाद में देश की पहली सिंधी फिल्म ‘अवाना’ (1958) से शुरुआत की और बॉम्बे टॉकीज छोड़ कर आए शशिधर मुखर्जी के साथ तीन साल (पहले साल 750, दूसरे साल पंद्रह सौ और तीसरे साल तीन हजार रुपए मासिक) का अनुबंध किया। इसी अनुबंध के तहत बनी थी उनकी पहली हिंदी फिल्म ‘लव इन शिमला’ (1960)।
साधना ने बीआर चोपड़ा की मल्टीस्टारर फिल्म ‘वक्त’ (1965) में जो चूड़ीदार सलवार-कमीज पहना था और ‘लव इन शिमला’ में जिस तरह की हेअर स्टाइल रखी थी, उनकी खूब नकल हुई। साधना के माथे पर करीने से रखे गए केश तो एक ऐब छुपाने के लिए थे। फिल्म के निर्देशक आरके नैयर कैमरे में साधना के बडेÞ नजर आने वाले माथे को ढंकना चाहते थे। आर्डी हैपबर्न (ब्रिटिश अभिनेत्री, मॉडल) के फैन नैयर ने इसे ढंकने के लिए साधना के माथे पर हैपबर्न की तरह बाल रख दिए, यही ‘साधना कट’ बन गई।

साधना की हेअर स्टाइल देखकर ‘परख’ (1960) के निर्देशक बिमल राय को हार्ट अटैक आते-आते बचा था क्योंकि उनकी निर्माणाधीन फिल्म में साधना गांव की एक लड़की की भूमिकामें थी। हालांकि साधना ने बड़ी खूबसूरती से बिमल राय के गले यह बात उतार दी कि बालों को पीछे कर यह स्टाइल बदली जा सकती है। ‘लव इन शिमला’ और ‘परख’ साथ-साथ बनी, मगर दर्शकों को हेअर स्टाइल का फर्क पता नहीं चला। साधना के चूड़ीदार का भी किस्सा है। अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी में फिल्माई गई मुसलिम सामाजिक फिल्म ‘मेरे महबूब’ 1963 की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म थी। इसमें साधना ने कास्ट्यूम डिजाइनर भानु अथैया के साथ मिलकर चूड़ीदार और फ्रॉक तैयार करवाई थी जिसकी खूब तारीफ भी हुई। जब ‘वक्त’ के कास्ट्यूम की बात चली, तो साधना ने यश चोपड़ा से कहा कि क्यों नहीं चूड़ीदार पर कुरता पहना जाए। चोपड़ा ने इसे खारिज करते हुए साधना से कहा कि चूंकि वह मुसलिम सामाजिक ‘मेरे महबूब’ में काम कर चुकी हैं, इसलिए उनके दिमाग पर चूड़ीदार का भूत सवार है।

चोपड़ा के नकार के बावजूद साधना ने भानु अथैया से चूड़ीदार सलवार और कुरता सिलवाया। एक दिन जब यश चोपड़ा साधना के घर आए तो साधना ने वही चूड़ीदार-कुरता पहना। चोपड़ा देखते ही रह गए। उन्होंने ड्रेस की बड़ी तारीफ की और एक तरह से साधना को हरी झंडी मिल गई। ‘मेरे महबूब’ और ‘वक्त’ में साधना ने चूड़ीदार पहना था, लिहाजा फिल्म इंडस्ट्री में चूड़ीदार-कुरते की चर्चा होने लगी। हैरानी की बात यह थी कि ‘वक्त’ का प्रीमियर हुआ तो उसमें भी चूड़ीदार-कुरता पहने आई महिलाओं की बहार थी। जब फिल्म हिट हुई तो इंडस्ट्री में पहले से ही मशहूर हो चुका चूड़ीदार-कमीज आम जनता के बीच ऐसे चलन में आया कि आज भी फैशन से बाहर नहीं हुआ है।

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