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हमारी याद आएगीः सहगल को पृथ्वीराज कपूर का गाना सुनना पड़ता था

तीस के दशक की शुरुआत में कलकत्ता के एक घर में दो युवा एक साथ रहते थे।

कुंदनलाल सहगल

कुंदनलाल सहगल- 11 अप्रैल, 1904- 18 जनवरी, 1947
कोलकाता की एक कंपनी ने सहगल के संघर्ष के दिनों में उनके दो गाने ‘झुलनो झुलाओ…’ और ‘होरी हो ब्रजराज…’ रिकॉर्ड किए जिन्हें खूब लोकप्रियता मिली और कंपनी ने अच्छा पैसा बनाया। सहगल को इसके लिए मिले थे 25 रुपए। कंपनी के उदार मालिक को लगा कि सहगल को लाभ में ‘कुछ अतिरिक्त’ मिलना चाहिए लिहाजा उसने इस आशय का प्रस्ताव दिया। मगर सहगल ने इनकार करते हुए कहा कि उन्हें उनकी मेहनत का पैसा मिल गया है और कंपनी के मालिक को जोखिम उठाने का इनाम।

तीस के दशक की शुरुआत में कलकत्ता के एक घर में दो युवा एक साथ रहते थे। एक जम्मू से आकर कुछ बनने के लिए संघर्ष कर रहा था, तो दूसरा पेशावर से। पेशावरी नौजवान नाटकों का शौकीन था। स्थानीय रामलीला में वह लक्ष्मण की भूमिका करता था। वह ढेर सारे नाटकों में काम कर चुका था, कबड्डी खिलाड़ी था और पहलवान भी। वह हट्टाकट्टा-ऊंचापूरा और सनी देओल की तरह हीमैन था। उसकी आवाज शेर की दहाड़ के समान थी। आम बातचीत में भी उसकी आवाज की धमक महसूस की सकती थी। उसकी मां का निधन हो चुका था। उसका बचपन अपने दादा के साथ गुजरा, जो समुंदरी (जिला फैजाबाद ) के तहसीलदार थे।

पेशावरी नौजवान अपनी चाची से कुछ रुपए उधार लेकर पहले मुंबई पहुंचा। वहां सिनेमा में किस्मत आजमाई। उन दिनों कोलकाता के न्यू थियेटर्स का बोलबाला था लिहाजा यह नौजवान अपना भविष्य बनाने और रोजीरोटी कमाने के लिए यहां आया था। इसके उलट जम्मू का नौजवान सपनीली आंखों वाला, कोमल और छरहरा था। वह शर्मीला और संगीत में रुचि रखता था। उसके पिता जम्मू कश्मीर में तहसीलदार थे और व्यस्त रहते थे लिहाजा उसका बचपन अपनी धार्मिक प्रवत्ति की मां के साथ भजन-कीर्तन करते-सुनते बीता। विधाता ने उसके गले में कोयल बिठा दी थी। कोलकाता में वह भी रोटीरोजगार के चलते आया था। उसने एक कंपनी में सेल्समैन और होटलों की मैनजरी भी की।

दोनों ही नौजवान एक ही घर में साथ-साथ रहते थे। संघर्ष को छोड़ दें तो उनमें बहुत कम समानताएं थीं। दोनों को ही एक दूसरे से सहज ईर्ष्या थी। शर्मीलेपन और हिम्मत की कमी के कारण चाहे जम्मू का नौजवान अपनी दमित इच्छाओं को पूरा नहीं कर पा रहा था, मगर पेशावरी नौजवान में यह हिम्मत थी। उसे लगा कि अभिनय की जिस दुनिया में वह काम कर रहा है उसमें संगीत बहुत महत्त्वपूर्ण है। उसे संगीत सीखना चाहिए। लिहाजा एक दिन कबाड़ी की दुकान से वह एक तानपूरा खरीद लाया और घर में रियाज करने लगा। मगर यह रियाज जम्मू के नौजवान के लिए बवालेजान बन गया। उसे लगता था मानो बादल गरज रहे हों। हालांकि यह दौर बहुत ही कम समय चला। बाद में दोनों ही नौजवानों ने फिल्मों की दुनिया में खूब नाम कमाया। शेर की दहाड़ जैसी आवाज वाले पेशावरी नौजवान को सिनेमा प्रेमी पृथ्वीराज कपूर के नाम से जानते हैं और जिसके गले में कोयल कूकती थी उसे कुंदन लाल सहगल यानी केएल सहगल जिनकी कल, गुरुवार, पुण्यतिथि थी।

लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी, किशोर कुमार जैसे लब्धप्रतिष्ठ गायकों के दिलों में सहगल के साथ गाने का अरमान पला। जब 70 के दशक में लता मंगेशकर को पता चला कि सहगल की पेटी, हॉरमोनियम, कोलकाता में है, तो वह उस पेटी के मुंहमांगे दाम देने के लिए तैयार हो गई थीं। एक पूरी पीढ़ी सहगल की तरह अनुनासिक गायन (हल्का-सा नाक का इस्तेमाल कर) की कोशिश करती रही। मगर अनुनासिकता की आकाशगंगा में सहगल आज भी ध्रुव तारे की तरह अटल है।

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