ताज़ा खबर
 

हमारी याद आएगीः जो काम हीरो नहीं कर सका हीरोइन ने कर दिखाया

मूक फिल्मों के दौर में महिला कलाकारों की कमी थी क्योंकि प्रतिष्ठित घराने की महिलाएं तो दूर कोठेवालियां और तवायफें भी सिनेमा को सम्मान की नजर से नहीं देखती थीं। तब विदेशी मूल की कई अभिनेत्रियां इस कारोबार को खड़ा करने के लिए आगे आईं। इनमें सबसे प्रमुख नाम था सुलोचना यानी रूबी मायर्स का। हिंदी सिनेमा की पहली सुपर स्टार और सबसे महंगी इस अभिनेत्री की कल 37वीं पुण्यतिथि है।

रूबी मायर्स (1907-10 अक्तूबर, 1983)

रूबी मायर्स (1907-10 अक्तूबर, 1983)

मूक फिल्मों के दौर में कलाकारों का पढ़ा-लिखा होना जरूरी नहीं था क्योंकि कैमरे के सामने संवाद नहीं बोलने पड़ते थे। 1931 में जब सिनेमा ने बोलना शुरू किया तो कई कलाकारों के सामने मुसीबत खड़ी हो गई थी। संवाद बोलना उनके लिए टेढ़ी खीर था। लिहाजा हुआ यह कि जो महाराष्ट्रियन पहलवान मास्टर विट्््ठल (अभिनेत्री नंदा के पिता) मूक फिल्मों के सुपर स्टार थे वह हाशिए पर चले गए। विट्ठल पहली बोलती फिल्म ‘आलमआरा’ के हीरो थे और एक्शन फिल्मों में उनकी तूती बोलती थी। ‘आलमआरा’ में हिंदी संवाद न बोल पाने की कमजोरी को दूर करने के लिए उन्हें संवाद ही नहीं दिए गए थे। विट्ठल उस जमाने में 2500 रुपए महीना तनख्वाह पर काम करते थे, जो बड़ी रकम थी। फिल्मों के बोलने के बाद वे हिंदी छोड़ मराठी फिल्में करने लगे।

कैमरे के सामने हिंदी संवाद बोलने का जो काम मास्टर विट्ठल नहीं कर सके, वह यहूदी मूल की रूबी मायर्स ने कर दिखाया, जो पुणे में पैदा हुई थी। फिल्मों में आने के बाद रूबी ने अपना नाम सुलोचना (सुलोचना लाटकर नहीं) रख लिया था। नाम बदलने का काम मूक फिल्मों के दौर में यहूदी मूल की अभिनेत्रियों फिरोजा बेगम (सुसन सोलोमन) और प्रमिला ( इस्टर विक्टोरिया अब्राहम) ने भी किया। रूबी टेलीफोन आॅपरेटर थी, जिनकी सुंदरता पर रीझकर कोहिनूर कंपनी के मालिक मोहन भवनानी उन्हें फिल्मों में ले आए थे। हालांकि रूबी में आत्मविश्वास नहीं था कि वह अभिनय कर पाएंगी, मगर रूबी फिल्मों में आर्इं और सफल हुईं। उनका मूक फिल्मों में इतना दबदबा हो गया था कि मासिक तनख्वाह 250 रुपए से कुछ ही सालों में पांच हजार रुपए तक पहुंच गई।

डी बिलिमोरिया के साथ उनकी जोड़ी की फिल्में खूब चलती थीं। रूबी की फिल्में ‘टाइपिस्ट गर्ल’ (1926), वाइल्ड कैट ऑफ बॉम्बे (1927), ‘माधुरी’ (1928), ‘अनारकली’ (1928), ‘इंदिरा बीए’ (1929), ‘सुलोचना’ (1933) महिला प्रधान होती थीं। रूबी मायर्स को हिंदी नहीं आती थी। जब 1932 में बोलती फिल्म ‘आलमआरा’ बनी तो रूबी के लिए मुसीबत खड़ी हो गई। रूबी ने इसका मुकाबला करना तय किया। उन्होंने एक साल तक खुद को फिल्मी दुनिया से दूर रखा और हिंदी सीखनी शुरू की। साल भर बाद जब कामचलाऊ हिंदी सीख कर रूबी लौटीं, तो निर्माताओं ने उनकी कामयाबी को भुनाना तय किया। तब हुआ यह कि रूबी की जो मूक फिल्में हिट हुई थी, उन्हीं को बोलती फिल्मों में ढाल दिया गया।

‘अनारकली’ 1935 में फिर से बनाई गई। ‘इंदिरा बीए’ की तरक्की हो गई और वह ‘इंदिरा एमए’ (1934) नाम से रिलीज की गई। ‘वाइल्ड कैट आॅफ बॉम्बे’ हिंदी का तड़का लगने के बाद ‘बंबई की बिल्ली’ (1936) बन गर्इं. जिसमें रूबी ने आठ भूमिकाएं कीं। फिल्मों के बोलने के बाद हिंदी संवाद बोलने का जो आत्मविश्वास मास्टर विट्ठल नहीं जुटा पाए, रूबी ने जुटाया और खुद को फिर से स्थापित किया।

दौलत और शोहरत वापस रूबी के कदम चूमने लगीं। फिर रूबी ने एक ऐसा निर्णय लिया जो उनके लिए घातक बन गया। उन्होंने फिल्म निर्माण कंपनी खोल ली। बतौर निर्माता उन्हें नुकसान उठाना पड़ा और देखते ही देखते दौलत स्वाहा हो गई। रूबी को अपने आखिरी दिन आर्थिक संकटों में निकालने पड़े।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 एक बार लगा कि मेरा करिअर खत्म हो गया : आमिर खान
2 मुंबई पुलिस का खुलासा- न्यूज चैनलों की TRP में हो रहा था ‘खेल’, कहा- Republic टीवी पर भी शक
3 ‘नियम-कायदों में बदलाव चाहती थी’, TMKOC के सेट पर था ईर्ष्या और पॉवर गेम का माहौल? ‘अंजलि भाभी’ ने किया बयां
यह पढ़ा क्या?
X