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फिल्म लैला मजनू की समीक्षा: ऐतिहासिक किरदारों को कमजोर करती फिल्म

फिल्म की सबसे बड़ी खूबी है कश्मीर के खूबसूरत नजारे। बहुत दिनों बाद किसी फिल्म में कश्मीर की जन्नत दिखी है। फिल्म के कुछ गाने ठीक-ठाक हैं। तृप्ति मासूम लगी हैं और उनकी शरारती अदाएं भी दिल को लुभाती हैं, लेकिन मोहब्बत में तड़पती लैला के किरदार को परदे पर उतारने में वह कामयाब नहीं हो पाई हैं।

निर्देशक- साजिद अली, कलाकार- अविनाश तिवारी, तृप्ति डिमरी, मीर सरवर, सुमित कौल।

जिन लोगों ने 2014 में आए ‘युद्ध’ नाम के धारावाहिक में अविनाश तिवारी को खलनायक के किरदार में देखा होगा, उनके लिए यह सोचना मुश्किल होगा कि वे एक रोमांटिक हीरो का किरदार भी निभा सकते हैं। किरदार भी कोई छोटा-मोटा नहीं बल्कि प्यार की मिसाल बन चुके मजनू का। जी हां, लैला मजनू की कहानियों वाला मजनू। लैला मजनू के प्यार पर वैसे तो कई फिल्में बन चुकी हैं, लेकिन जाने-माने निर्देशक इम्तियाज अली के छोटे भाई साजिद अली एक बार फिर इस कहानी को परदे पर उतारा है। आज के कश्मीर की पृष्ठभूमि में बनी उनकी फिल्म ‘लैला मजनू’ में लैला बनी हैं तृप्ति डिमरी।

फिल्म की कहानी कुछ यूं है कि कश्मीर के एक नामी होटल मालिक के बेटे कैस भट्ट (अविनाश तिवारी) पर फिदा हो जाती है लैला (तृप्ति)। लैला कॉलेज में पढ़ती है और इसी बीच उसकी मुलाकात कैस (मजनू का असली नाम भी कैस था) नाम के एक बिगड़े हुए अमीरजादे से होती है। कैस के कई लड़कियों से रिश्ते होने के किस्से शहर में मशहूर हैं। इसके बावजूद कैस और लैला करीब आते हैं और दोनों को प्यार हो जाता है, लेकिन परिवार और जमाने ने न तो पहले लैला मजनू को मिलने दिया था और न अब मिलने देते हैं। ऐसे में मजनू का दीवाना होना लाजमी था क्योंकि लैला किसी और की हो जाती है।

फिल्म का अंत लगभग वैसा ही है जैसा लैला मजनू की कहानी में होता है। फर्क सिर्फ यह है कि मजनू का किस्सा जिस तरह फिल्म में दिखाया गया है, उसमें विश्वसनीयता नहीं दिखती। इसके अलावा दोनों परिवारों के बीच अदावत वाले मामले को भी निर्देशक ने बस किसी तरह निपटा दिया है। फिल्म की सबसे बड़ी खूबी है कश्मीर के खूबसूरत नजारे। बहुत दिनों बाद किसी फिल्म में कश्मीर की जन्नत दिखी है। फिल्म के कुछ गाने ठीक-ठाक हैं। तृप्ति मासूम लगी हैं और उनकी शरारती अदाएं भी दिल को लुभाती हैं, लेकिन मोहब्बत में तड़पती लैला के किरदार को परदे पर उतारने में वह कामयाब नहीं हो पाई हैं। अविनाश तिवारी मजनू के रूप में अपनी छाप तो नहीं छोड़ते, लेकिन कश्मीर की वादियों में दीवानों की तरह भागने वाले शख्स के रूप में वे दर्शकों के दिल की गहराइयों में उतरने में कामयाब हो जाते हैं। हालांकि अगर निर्देशक ने फिल्म पर थोड़ा और काम किया होता तो यह बेहतर बन सकती थी।

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