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कड़वी हवा- मृत्यु के इंतजार में जीवन का गीत

इस फिल्म को पिछले साल वेनिस अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में यूनेस्को गांधी मेडल पुरस्कार मिल चुका है।

Author Published on: November 26, 2017 5:44 AM
कड़वी हवा फिल्म का एक दृश्य।

अजित राय

गोवा फिल्म समारोह के भारतीय पैनोरमा में दिखाई गई नीला माधव पांडा की फिल्म ‘कड़वी हवा’ और बेनाले कॉलेज वेनिस के शुभाशिष भुटियानी की ‘मुक्ति भवन’ अलग-अलग संदर्भों में मृत्यु का वृतांत है। बुंदेलखंड में अकाल के कारण कर्ज न चुका पाने पर किसानों की आत्महत्या की सच्ची कहानियों पर आधारित ‘कड़वी हवा’ संजय मिश्रा के हैरतअंगेज अभिनय के लिए यादगार रहेगी। इसमें उन्होंने एक अंधे बूढ़े किसान की भूमिका निभाई है। उनका सामना कर्ज दिलाने और वसूली करनेवाले बैंक एजंट (रणवीर शौरी) से होता है। अकाल के कारण फसल नष्ट होने पर कर्ज न चुका पाने और इकलौते बेटे के आत्महत्या करने के बाद पूरे परिवार को संभालने का जिम्मा अंधे और बूढ़े किसान के कंधों पर है। धौलपुर (राजस्थान) से सटे चंबल के बीहड़ों के गांव में अंधे किसान और लोन एजंट के जटिल रिश्तों के बीच कहानी में कई छोटे छोटे मोड़ हैं। किसानों के खून चूसनेवाला लोन एजंट भी कोई खलनायक नहीं है। वह परिस्थतियों से मजबूर है। अंत में जब वह टेलिविजन पर देखता है कि ओड़ीशा में आए समुद्री तूफान में उसका गांव तबाह हो गया, उसका परिवार खत्म हो गया तो वह फूट फूटकर रो रहा है। तब उसे महसूस होता है किसी अपने की अकाल मृत्यु का दुख क्या होता है।

आदिल हुसैन और ललित बहल की मुख्य भूमिकावाली ‘मुक्ति भवन’ बनारस में आकर मोक्ष की चाहत में मरने की इच्छा रखनेवाले बूढ़े लोगों की कहानियां है। एक दिन अचानक एक रिटायर शिक्षक दयानंद (ललित बहल) को 77वें साल में इलहाम होता है कि उसका अंतिम समय आ गया है। वह अपने इकलौते बेटे (राजीव) से कहता है कि उसे बनारस ले चले और मुक्ति भवन में भर्ती करा दे। बेटे की समस्या है कि वह नौकरी की व्यस्तताओं में कैसे समय निकाले। पिता की जिद के सामने पूरे परिवार को झुकना पड़ता है। बनारस के मुक्ति भवन का अपना संसार है। वहां के सभी बाशिंदे मृत्यु के इंतजार में जिंदगी जी रहे हैं।
दयानंद की दोस्ती वहां एक ऐसी महिला विमला (75) से होती है जो अठारह साल से मृत्यु का इंतजार कर रही है। फिल्म यहां से पिता और पुत्र के आपसी रिश्तों की अंतरंग और जटिल दुनिया में जाती है जहां दोनों को अतीत की स्मृतियों का सामना करना है। इस फिल्म को पिछले साल वेनिस अंतरराष्टÑीय फिल्म समारोह में यूनेस्को गांधी मेडल पुरस्कार मिल चुका है।

 

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