कॉलेज से शुरू हुई मोहब्बत जो मुकम्मल हुई ओशो के आश्रम में। हिंदी सिनेमा में फिल्ममेकर और संगीतकार विशाल भारद्वाज और उनकी पत्नी रेखा भारद्वाज की प्रेम कहानी काफी मशहूर है। ये कोई आम लव स्टोरी नहीं है, बल्कि संगीत, त्याग और समर्पण की एक खूबसूरत कहानी है। दिल्ली के कॉलेज में साथ पढ़ने से लेकर ओशो के आश्रम तक का सफर। बताया जाता है कि जब करियर की चिंता में रेखा भारद्वाज घर परिवार छोड़कर ओशो के आश्रम में रहने लगीं थीं तो कैसे उनके पीछे उसी आश्रम में जा पहुंचे थे उनके पति विशाल भारद्वाज।

गायिका रेखा भारद्वाज और विशाल भारद्वाज की मुलाकात 1980 में दिल्ली के हिंदू कॉलेज में एक फंक्शन के दौरान हुई थी। दोनों साथ में एक ही बैच में पढ़ते थे, रेखा को कॉलेज के समय से ही सिंगर बनने की चाहत थी।

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कॉलेज से ही दोनों के बीच बेहद गहरी दोस्ती हो गई। एक दूसरे के साथ लंबा समय बिताने के बाद दोनों ने 1991 में कोर्ट मैरिज कर ली। शादी के बाद दोनों अपने सपने पूरे करने के लिए मुंबई आ गए। उन्होंने फिल्म और संगीत की दुनिया में करियर बनाना शुरू किया।

‘मकबूल’, ‘हैदर’ जैसी फिल्में बनाने वाले निर्देशक विशाल भारद्वाज कभी भी फिल्ममेकर नहीं बनना चाहते थे, उनका मोह हमेशा से संगीत के लिए था क्योंकि वह एक कला पसंद परिवार से आते थे। उनके पिता जाने माने कवि और गीतकार थे। साल 1996 में गुलजार की फिल्म ‘माचिस’ में उन्होंने संगीत दिया और उन्हें एक बड़ी पहचान मिली। काफी कम समय में देखते ही देखते विशाल भारद्वाज को बॉलीवुड में बतौर संगीतकार एक बड़ी पहचान मिल गई।

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दूसरी तरफ रेखा भारद्वाज को अपने जीवन में प्यार तो मिला लेकिन करियर कुछ खास नहीं चल रहा था। रेखा भारद्वाज ने साल 1997 में आई फिल्म ‘चाची 420’ से अपने संगीत सफर की शुरूआत की। इस फिल्म में उनके म्यूजिक कंपोजर उनके पति विशाल भारद्वाज ही थे, लेकिन उन्हें इस गाने से कोई खास पहचान नहीं मिली।

करियर में आ रहे उतार चढ़ाव की वजह से वह डिप्रेस हो गईं, उनके पास भले ही विशाल भारद्वाज जैसा हमसफर था लेकिन फिर भी वो अंदर से खुश नहीं थी। इस बात को खुद उन्होंने शुभांकर मिश्रा के साथ पॉडकास्ट में बताया। जिसके बाद वह सब छोड़कर जा पहुंची ओशो के आश्रम में। उन्होंने उस समय सब कुछ पीछे छोड़ दिया था।

हाल ही में सुनंदा शर्मा के साथ प्यार की गहराई पर बात करते हुए पत्रकार शुभांकर मिश्रा ने बताया कि ‘उस समय उनके पीछे विशाल भारद्वाज भी ओशो के आश्रम जा पहुंचे थें। कोई और होता तो शायद शादी टूट जाती। इसके बाद विशाल भारद्वाज ने करीब एक साल तक उनका इंतजार किया,जब वह वापस नहीं आईं तो विशाल उनके पास चले गए।’ इसके जवाब में सुनंदा ने उनसे कहा कि ‘कोई किसी से इतना प्यार कर सकता है क्या, जवाब आता है- हां विशाल भारद्वाज’।

आश्रम में आंतरिक शांति पाने के बाद, रेखा और विशाल लगभग एक-दो साल के भीतर वापस लौट आए। उनको फिल्मों में लाने के लिए और संगीत की दुनिया में पहचान देने के लिए विशाल भारद्वाज ने साल 2006 में फिल्म ‘ओंकारा’ बनाई। इस फिल्म में उन्होंने बतौर निर्देशक और सह लेखक काम किया। फिल्म में एक गाना था ‘नमक इश्क का’, इस गाने को आवाज दी रेखा भारद्वाज ने, और यही गाना उनके करियर का टर्निंग पॉइंट बना। इस गाने से उन्हें वो पहचान मिली जिसकी वो हकदार थीं। उसके बाद रेखा ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

फिल्म ‘ओंकारा’ की सफलता के बाद रेखा भारद्वाज घर-घर में लोकप्रिय हो गईं और बाद में उन्होंने विशाल के साथ मिलकर ‘ससुराल गेंदा फूल’, ‘फिर ले आया दिल’, और ‘रनिंग शादियां, जैसे कई शानदार गाने गाए।

रेखा भारद्वाज ने एक पॉडकास्ट में खुद बताया था कि ‘जरूरी नहीं आपकी पर्सनल लाइफ अच्छी है तो आप हर तरह से खुश ही रहे, ऐसा जरूरी नहीं हैं।’ उन्होंने इस पर विनोद खन्ना का उदाहरण देते हुए कहा था कि वो भी आंतरिक शांति के लिए अपने करियर के शिखर पर होते हुए सब कुछ पीछे छोड़कर ओशो के पास चले गए थे। कुछ इस तरह रेखा भारद्वाज और विशाल भारद्वाज की प्रेम कहानी हिंदी सिनेमा की खूबसूरत कहानियों में शामिल हो गई। जिसके प्यार में इंतजार, त्याग और एक दूसरे को साथ लेकर कामयाब होने की चाहत थी।