रील गाथा: फिल्म इंडस्ट्री में आमतौर पर एक फिल्म 1–3 साल में बनकर तैयार हो जाती है। लेकिन कुछ फिल्में ऐसी भी हैं, जिन्हें पूरा होने में 10, 14 या 16 साल तक लग गए। कभी बजट की वजह से, कभी डायरेक्टर के परफेक्शनिज़्म के कारण तो कभी कानूनी और प्रोडक्शन की अड़चनों से ये फिल्में लंबे समय तक अटकी रहीं। आइए जानते हैं ऐसी ही कुछ फिल्मों के बारे में, जिनका सफर रिलीज़ से पहले ही किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं था।

मुग़ल-ए-आज़म (1960)

भारतीय सिनेमा की सबसे भव्य फिल्मों में गिनी जाने वाली इस फिल्म का निर्माण कई बार रुका। कलाकारों के बदलाव, फाइनेंस की समस्या और तकनीकी चुनौतियों के कारण इसे पूरा होने में 14 साल लग गए। रिलीज़ के बाद इसने इतिहास रच दिया और आज भी क्लासिक मानी जाती है।

पाक़ीज़ा (1972)

मीना कुमारी और कमाल अमरोही के निजी रिश्तों में आई दरार की वजह से फिल्म की शूटिंग लंबे समय तक रुकी रही। कई सालों बाद जब शूटिंग दोबारा शुरू हुई तो मीना कुमारी की तबीयत भी खराब रहने लगी। फिल्म रिलीज़ हुई तो यह उनकी आखिरी फिल्मों में से एक साबित हुई और क्लासिक का दर्जा पा गई।

लव एंड गॉड (1986)

‘मुगल-ए-आज़म’ के बाद के. आसिफ ने इस फिल्म पर काम शुरू किया, लेकिन गुरु दत्त और बाद में संजीव कुमार के निधन के कारण फिल्म अधूरी रह गई। कई वर्षों बाद इसे जैसे-तैसे पूरा कर रिलीज़ किया गया।

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द मैन हू किल्ड डोन क्विक्सोट (2018)

यह फिल्म ‘डेवलपमेंट हेल’ का सबसे बड़ा उदाहरण मानी जाती है। फाइनेंस, कास्ट और लीगल दिक्कतों के कारण यह प्रोजेक्ट बार-बार रुका। आखिरकार 2018 में इसे रिलीज़ किया गया।

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बॉयहूड (2014)

इस फिल्म की सबसे बड़ी खासियत थी इसका अनोखा कॉन्सेप्ट। निर्देशक ने एक बच्चे की असली उम्र के साथ उसकी ग्रोथ को दिखाने के लिए हर साल थोड़ी-थोड़ी शूटिंग की। 6 साल के बच्चे से लेकर 18 साल के युवक तक की कहानी को असल समय में फिल्माया गया। यह प्रयोग सिनेमा इतिहास में मील का पत्थर साबित हुआ।