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शोले के क्लाइमैक्स से क्यों हुई थी छेड़छाड़, सिप्पी साहब को बदलना पड़ा था सीन

कहानी 1975 के आसपास की है। तब फिल्म के डायरेक्टर रमेश सिप्पी और स्क्रिप्ट राइटर...

‘शोले’ आज भी सदाबहार फिल्मों में टॉप पर है। यह बेहद क्सालिक पीस है। चाहे जय-वीरू की जोड़ी हो या बसंती का नाच। गब्बर को तो कोई भूल ही नहीं सकता। वह अपने आप में एक ‘फिलिम’ है। शोले को लेकर कई बातें आप जानते होंगे, लेकिन क्या आपको पता है कि इसके क्लाइमैक्स से छेड़छाड़ हुई थी। फिल्म में जिस गब्बर को पुलिस पकड़ लेती है। असली में वह ठाकुर के जरिए मौत के घाट उतारा जाता है। हां, यही असली क्लाइमैक्स था।

कहानी 1975 के आसपास की है। तब फिल्म के डायरेक्टर रमेश सिप्पी और स्क्रिप्ट राइटर सलीम-जावेद फिल्म के कहानी गढ़ने और किरदार ढूंढने में जुटे थे। यह सब काम पूरा होने के बाद फिल्म की शूटिंग बेंगलुरू के रामनगरम में हुई थी। 15 अगस्त 1975 को इसे रिलीज होना था। लेकिन सेंसर बोर्ड ने फिल्म के क्लाइमैक्स पर आपत्ति जताई। सर्टिफिकेट देने से मना कर दिया।

असली क्लाइमैक्स में ठाकुर नुकीले जूतों से गब्बर को धक्का देता है। वह खंभे पर लगी मोटी कील से जाकर भिड़ जाता है, जिससे उसकी मौत हो जाती है। मने यूं कहिए वही गब्बर को मौत के घाट उतारता है। सेंसर ने 20 जुलाई 1975 को कानून का हवाला देकर बदलने की बात कही थी। फिर क्या था, क्लाइमैक्स दोबारा शूट किया गया। 26 दिन लगे। फेरबदल हुए सीन में गब्बर कानून के हवाले कर दिया गया था। ठाकुर के मारने से पहले वहां पुलिस आ जाती है।

फिर फिल्म रिलीज हुई। शुरुआत के दो-तीन दिनों में प्रतिक्रिया अच्छी नहीं, तो सिप्पी साहब घबरा गए। उन्हें लगा कि फिल्म में अमिताभ के मरने की बात इसका असल कारण है। उन्होंने सलीम-जावेद से इस बारे में बात की। यहां तक कि उन्होंने इसमें बदलाव करने की बात भी कही थी। लेकिन उन्होंने दो-तीन और इंतजार करने के लिए कहा था। बाद में शोले का क्या हुआ, वह पूरी इंडस्ट्री जानती है।

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