बड़े बजट की फिल्मों में VFX अब सिर्फ विजुअल्स को खूबसूरत बनाने का जरिया नहीं रह गया है, बल्कि कहानी की दुनिया को गढ़ने का अहम हिस्सा बन चुका है। खासकर ‘रामायण’ और ‘वाराणसी’ जैसी फिल्मों में बड़े पैमाने पर दुनिया, युद्ध, भीड़, तबाही और ऐसे विजुअल्स तैयार करने की जरूरत होती है, जिन्हें वास्तविक सेट पर शूट करना आसान नहीं होता। इसी सिलसिले में जनसत्ता ने सीनियर वीएफएक्स स्पेशलिस्ट अंकित ब्रह्मभट्ट से बात की। उन्होंने फिल्मों के पर्दे के पीछे होने वाले काम और इसकी चुनौतियों के बारे में विस्तार से बात बताया।

अंकित ब्रह्मभट्ट के मुताबिक, एक्शन सीन्स में सबसे बड़ी चुनौती असली शूटिंग और VFX के बीच सही तालमेल बनाना होती है। एक्शन तेज होता है, इसलिए हर शॉट ऐसा दिखना चाहिए जैसे वह वास्तव में हुआ हो। किरदार, कैमरा और आसपास का माहौल एक-दूसरे से जुड़े हुए नजर आने चाहिए। इसके अलावा लाइटिंग, टेक्सचर, धूल, मलबे और टूट-फूट जैसी चीजों को हर शॉट में एक जैसा दिखाना भी जरूरी होता है। कोशिश यही रहती है कि दर्शक को VFX अलग से नजर न आए और पूरा सीन वास्तविक लगे।

बड़े पैमाने पर भीड़, विस्फोट और बड़े सीन कैसे तैयार होते हैं?

बड़े सीन को पूरी तरह कंप्यूटर पर बनाने के बजाय पहले यह देखा जाता है कि क्या-क्या चीजें असली में शूट की जा सकती हैं। इसके बाद VFX की मदद से उस सीन को बड़ा और बेहतर बनाया जाता है। भीड़, गाड़ियां, विस्फोट, टूट-फूट और बड़े इलाकों के लिए अलग-अलग डिजिटल चीजों, कंप्यूटर सिमुलेशन और कंपोजिटिंग का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें यह ध्यान रखना जरूरी होता है कि सब कुछ एक ही जगह का हिस्सा लगे और उसकी लाइटिंग और स्केल सही हो।

कैसे बनती है वो दुनिया, जो असल में है ही नहीं?

कई फिल्मों में ऐसी चीजें दिखानी होती हैं, जिन्हें असल दुनिया में शूट करना संभव नहीं होता। ‘पद्मावत’ और ‘बाहुबली’ जैसी फिल्मों में बड़े इलाके, ऐतिहासिक जगहें, सेनाएं, युद्ध और इमारतों को डिजिटल तरीके से तैयार किया गया। वहीं ‘अवतार’ जैसी फिल्मों में पूरी दुनिया, जीव-जंतु और प्राकृतिक माहौल तक कंप्यूटर की मदद से बनाया गया।

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हालांकि चीजें काल्पनिक होती हैं, लेकिन उन्हें देखने पर दर्शकों को असली लगना चाहिए। इसके लिए कलाकार असली दुनिया की चीजों से रेफरेंस लेते हैं, जैसे किसी चीज की बनावट, रोशनी, आकार, शरीर की बनावट और इमारतों का डिजाइन।

कितना VFX कैमरे से शूट फुटेज को बेहतर करता है और कितना नया बनाया जाता है?

अंकित के मुताबिक, यह पूरी तरह सीन पर निर्भर करता है। कई बार कैमरे से शूट किए गए फुटेज को ही आधार बनाया जाता है और उसमें VFX की मदद से चीजें जोड़ी जाती हैं। वहीं कुछ सीन पूरी तरह कंप्यूटर पर बनाए जाते हैं।

‘पद्मावत’ और ‘बाहुबली’ जैसी फिल्मों में शूट किए गए फुटेज को बड़ा करने, ज्यादा भीड़ दिखाने, युद्ध के सीन को विस्तार देने और आसपास की जगह को विशाल बनाने के लिए VFX का इस्तेमाल किया गया। वहीं बड़ी सेनाओं, डिजिटल जगहों और तबाही जैसे सीन्स के लिए पूरी तरह CG का सहारा लिया गया।

‘वाराणसी’ में कौन-सा VFX सीन दर्शकों को चौंका सकता है?

अंकित के मुताबिक, ‘वाराणसी’ के टीजर में सबसे खास चीज फिल्म की दुनिया का बड़ा स्केल है। इसमें अलग-अलग जगहें, अलग-अलग समय और पौराणिक चीजें एक साथ नजर आती हैं। हालांकि टीजर में अभी इसकी सिर्फ एक झलक दिखाई गई है।

उन्होंने बताया कि फिल्म में ऐसे कई सीन हैं, जो दर्शकों को हैरान कर सकते हैं। फिल्म का स्केल टीजर में दिखाई गई चीजों से भी काफी बड़ा है। हालांकि उन्होंने खास शॉट्स और VFX बनाने के तरीके के बारे में ज्यादा जानकारी देने से इनकार किया, क्योंकि फिल्म से जुड़ी कई चीजें अभी सामने नहीं लाई जा सकतीं।

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‘रामायण’ के दौर में कितना बदल गया है भारतीय VFX?

अंकित के मुताबिक, पिछले कुछ सालों में भारतीय VFX इंडस्ट्री में बहुत बड़ा बदलाव आया है। पहले तकनीक और बजट की सीमाएं थीं, लेकिन अब फिल्ममेकर्स और दर्शकों दोनों की उम्मीदें काफी बढ़ गई हैं।

आज बड़े प्रोजेक्ट्स में बेहतर तकनीक, बड़ी टीमें, डिजिटल दुनिया, सिमुलेशन और CG कैरेक्टर का इस्तेमाल किया जाता है।

‘रामायण’ जैसे प्रोजेक्ट में VFX सिर्फ शूट किए गए सीन में कुछ जोड़ने का काम नहीं करता। इसके जरिए पूरी दुनिया तैयार की जाती है, जिसमें जगहें, इमारतें, जीव-जंतु, युद्ध, भीड़ और बड़े पैमाने के सीन शामिल हैं। साथ ही यह भी ध्यान रखना पड़ता है कि कहानी दर्शकों को पहले से पता है, इसलिए विजुअल नए लगें लेकिन कहानी की मूल भावना बनी रहे।

क्या भारतीय VFX अब हॉलीवुड के स्तर तक पहुंच चुका है?

अंकित के मुताबिक, भारतीय फिल्ममेकर्स ने VFX के मामले में हॉलीवुड से काफी कुछ सीखा है। खासकर प्लानिंग, बड़े स्तर पर काम और VFX की पूरी प्रक्रिया को लेकर। अब VFX की तैयारी शूटिंग के बाद शुरू नहीं होती, बल्कि फिल्म की शुरुआत से ही इसकी योजना बनाई जाती है। इसमें कॉन्सेप्ट डिजाइन, प्री-विजुअलाइजेशन, डिजिटल एसेट्स और शूटिंग की तैयारी शामिल होती है।

‘बाहुबली’, ‘ब्रह्मास्त्र’ और ‘RRR’ जैसी फिल्मों ने भारतीय सिनेमा में बड़े डिजिटल सीन और VFX के इस्तेमाल को एक नया स्तर दिया है। लेकिन अंकित का मानना है कि भारत को सिर्फ हॉलीवुड की नकल नहीं करनी चाहिए। हमारी कहानियां, पौराणिक कथाएं, संस्कृति और अपनी अलग पहचान हमारी सबसे बड़ी ताकत हैं।

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अब VFX की छोटी-सी गलती भी पकड़ लेते हैं दर्शक

अंकित ने बताया कि पिछले 10-15 सालों में भारतीय दर्शक VFX को लेकर काफी समझदार हो गए हैं। ‘बाहुबली’, ‘RRR’, ‘ब्रह्मास्त्र’ और ‘कल्कि 2898 AD’ जैसी फिल्मों को देखने के बाद दर्शक समझने लगे हैं कि अच्छा VFX कैसा दिखता है।

अब अगर किसी डिजिटल किरदार के पैर जमीन पर सही तरह से टिके हुए न लगें, लाइटिंग गलत हो, टेक्सचर नकली लगे या किसी चीज की चाल-ढाल सही न लगे, तो दर्शकों को तुरंत महसूस हो जाता है कि कुछ ठीक नहीं है।

अंकित का मानना है कि दर्शकों की बढ़ती समझ अच्छी बात है। इससे फिल्ममेकर्स और VFX कलाकारों पर बेहतर काम करने का दबाव बढ़ता है। आज सिर्फ किसी सीन को शानदार दिखाना काफी नहीं है, बल्कि उसे फिल्म की दुनिया में असली और भरोसेमंद भी दिखना चाहिए।