हाल ही में गाजियाबाद में तीन नाबालिग बहनों ने कथित तौर पर आत्महत्या कर ली है। तीनों की मौत बिल्डिंग की नौवीं मंजिल से गिरने के बाद हुई और इस मामले में अलग-अलग तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। कहा जा रहा है कि लड़कियां कथित तौर पर एक टास्क-बेस्ड कोरियन गेम की आदी थीं। इसके बाद कुछ इंटरनेट यूजर्स नाबालिगों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाने या पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने की मांग कर रहे हैं। अब, दिग्गज फिल्म निर्माता राम गोपाल वर्मा ने ऐसी मांगों की निंदा करते हुए कहा है कि इस कदम के बच्चों पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
राम गोपाल वर्मा ने X पर लंबा चौड़ा पोस्ट शेयर किया है, जिसका टाइटल उन्होंने लिखा है, “बैन द बैनर।” राम गोपाल वर्मा का कहना है कि नाबालिगों को सुरक्षा के नाम पर सोशल मीडिया से दूर रखना नुकसानदायक हो सकता है। उनके मुताबिक आज सोशल मीडिया सिर्फ टाइमपास का जरिया नहीं रह गया है, बल्कि यह सीखने, नए कौशल हासिल करने और लोगों से जुड़ने का एक अहम माध्यम बन चुका है। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया को सिर्फ मनोरंजन समझना गलत सोच है, क्योंकि यहीं से बच्चों और युवाओं को रियल-टाइम जानकारी, नई स्किल्स और आगे बढ़ने के मौके मिलते हैं।
वर्मा ने तर्क दिया कि अगर भारत में नाबालिगों के लिए सोशल मीडिया पर पाबंदी लगाई गई, तो इसका फायदा दूसरे देशों के बच्चों को होगा। वहां के बच्चे इन प्लेटफॉर्म के जरिए कोडिंग, भाषाएं, उद्यमिता, विज्ञान जैसे विषय आसानी से सीख पाएंगे, जबकि भारतीय बच्चे पीछे रह सकते हैं। उनका मानना है कि ऐसे फैसलों से बच्चों की सुरक्षा तो जरूरी है, लेकिन सीखने और आगे बढ़ने के अवसरों को पूरी तरह रोकना सही नहीं होगा।
राम गोपाल वर्मा ने लिखा है, “16 साल से कम उम्र के बच्चों को तथाकथित आपत्तिजनक कंटेंट से बचाने के नाम पर सोशल मीडिया पर रोक लगाने की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इससे वे आज की बहुत ज़्यादा प्रतिस्पर्धी वैश्विक सूचना अर्थव्यवस्था में पीछे रह जाएंगे। यह सोचना कि सोशल मीडिया सिर्फ समय बर्बाद करने का साधन है, गलत और नासमझी भरी सोच है। आज के समय में सोशल मीडिया ताज़ा जानकारी, नए कौशल और नेटवर्क पाने का सबसे बड़ा जरिया बन चुका है, जो यह तय करता है कि कौन आगे बढ़ेगा। जिन देशों में सोशल मीडिया पर रोक नहीं है, वहां के बच्चे यूट्यूब ट्यूटोरियल, रेडिट चर्चाएं, टिकटॉक पर समझाने वाले वीडियो और ग्लोबल फोरम जैसे प्लेटफॉर्म्स से लगातार सीखते रहते हैं। यहां उन्हें कोडिंग, भाषाएं, बिज़नेस, विज्ञान और करंट अफेयर्स पारंपरिक क्लासरूम से कहीं ज़्यादा तेज़ और दिलचस्प तरीके से सीखने को मिलता है।”
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“वहीं जिन देशों में रोक है, वहां के बच्चों को अलग-अलग नजरिए, ब्रेकिंग न्यूज़ और मौके बहुत देर से या कभी-कभी ही मिलते हैं। इससे बच्चों के बीच सीधी प्रतिस्पर्धा में बड़ा फर्क पैदा हो जाता है। बिना रोक वाले देश का 14 साल का बच्चा जानकारी को समझने में माहिर हो जाता है, ऑनलाइन कम्युनिटी बनाता है, नए विचारों पर प्रयोग करता है और आगे निकल जाता है। जबकि रोक वाले देश के बच्चे उस अनौपचारिक सीख, नई खोजों और शुरुआती डिजिटल अनुभव से वंचित रह जाते हैं, जिसका असर आगे चलकर पढ़ाई, करियर और सोच पर पड़ता है। सोशल मीडिया पर रोक को “सुरक्षा” के नाम पर सही ठहराया जाता है, लेकिन यह आज की दुनिया की हकीकत को नजरअंदाज करता है। आज जानकारी की रफ्तार ही व्यक्ति और देश—दोनों की सफलता तय करती है। रोक लगाने से खतरे खत्म नहीं होते, बल्कि इसका फायदा दूसरे देशों के बच्चों को मिल जाता है और असमानता और बढ़ जाती है।”
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अपने पोस्ट के अंत में उन्होंने कहा,”बच्चे आखिरकार दुनिया से रूबरू होंगे ही, लेकिन जिन्हें शुरू में सही दिशा में सीखने का मौका नहीं मिला, वे कम तैयार, कम लचीले और कम जानकारी वाले साबित हो सकते हैं। आज के दौर में, जहां ऑनलाइन ज्ञान तेजी से बढ़ता है, ऐसी पाबंदियां बच्चों को सुरक्षित नहीं बनातीं, बल्कि उन्हें डिजिटल दौड़ में देर से पहुंचने वाला बना देती हैं। जिन देशों में पहुंच खुली है, वे अपने युवाओं को आगे बढ़ने की मजबूत शुरुआत दे रहे हैं। कुछ मामलों में आपत्तिजनक कंटेंट की चिंता सही हो सकती है, लेकिन जानकारी से वंचित करने की कीमत उससे कहीं ज़्यादा बड़ी है। यह लंबे समय की क्षमता को छोड़कर तात्कालिक सुरक्षा चुनने के खतरे की गंभीर चेतावनी है।”
- अगर आप या आपका कोई परिचित मानसिक तनाव, अवसाद या आत्महत्या से जुड़े विचारों से जूझ रहा है, तो कृपया मदद लेने में संकोच न करें। भारत में 24×7 उपलब्ध आत्महत्या रोकथाम हेल्पलाइन पर संपर्क करें— 14416 या 1-800-891-4416
- आपकी पहचान पूरी तरह गोपनीय रखी जाएगी।
