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हमारी याद आएगीः जब एक ही रात में हो गया फिल्म का संगीत तैयार

कुदरत ने इनसान को विपरीत हालातों का मुकाबला करने की अद्भुत क्षमता दी है। आपात स्थितियों में यह क्षमता कई गुना बढ़ जाती है। इस बात के कई उदाहरण है कि जरूरत पड़ने पर किसी संगीतकार ने मिनटों में किसी गाने की धुन बना डाली या चुटकी बजाते ही किसी गीतकार ने गीत लिख दिया। गीतकार राजेंद्र कृष्ण के सामने भी एक बार ऐसी ही स्थिति आई थी, जिसमें एक ही रात में न सिर्फ उन्होंने फिल्म के पूरे नौ गाने लिख डाले बल्कि संगीतकार सी रामचंद्र ने उनकी धुनें भी तैयार कर ली। फिल्म थी ट्रेजिडी किंग दिलीप कुमार और ट्रेजिडी क्वीन मीना कुमारी की ‘आजाद’, जो कई मानो में महत्वपूर्ण फिल्म थी।

राजेंद्र कृष्ण ने लगभग सभी चोटी के संगीतकारों के लिए गाने लिखे थे।

राजेंद्र कृष्ण (6 जून , 1919 – 23 सितंबर, 1987)

वाकया 1954 का है। दक्षिण के एक निर्माता एसएम श्रीरामुलु नायडू ने तमिल फिल्म ‘मलाईकल्लन’ बनाई और उसे पांच और भाषाओं में बनाना तय किया, जिनमें हिंदी भी शामिल थी। यह देश की पहली बहुभाषाई फिल्म थी। तब फिल्में या तो बंबई, कलकत्ता में बनती थीं या पुणे कोल्हापुर में। कोयंबटूर में फिल्म बनाने के कारण उन्हें कोयंबटूर मूवी मुगल कहा जाने लगा था। मूल तमिल ‘मलाईकल्लन’ का तेलुगू, मलयालम, कन्नड़, और सिंहली चार भाषाओं में संगीत देने का काम तो एसएम सुबैया नायडू के जिम्मे था, हिंदी फिल्म के लिए संगीतकार की तलाश थी। तो एक दिन श्रीरामुलु सूटकेस में नोटों के बंडल रखकर मुंबई आ गए। तब संगीतकार नौशाद की तूती बोलती थी। लिहाजा उनके पास जाकर कहा कि फिल्म का संगीत महीने भर में तैयार करना है। एक-एक गाने का रिहर्सल महीने-महीने भर करवाने वाले नौशाद ने कहा कि असंभव। वे चट मंगनी पट ब्याह वाला काम नहीं करते। तब श्रीरामुुलु जा पहुंचे सी रामचंद्र के पास जो ‘भोली सूरत के दिल के खोटे…’ (अलबेला) और ‘ये जिंदगी उसी की है जो किसी का हो गया…’ (अनारकली) जैसे गानों से चर्चा में थे।

श्रीरामुलु ने कहा कि उन्हें महीने भर में फिल्म का संगीत तैयार करवाना है। किसी होटल में संगीतकार के रहने की व्यवस्था कर दी जाएगी। पैसा जो मांगो मिल जाएगा। रामचंद्र तैयार हो गए और गीत लिखने के लिए साथ ले लिया अपने प्रिय गीतकार राजेंद्र कृष्ण को। दोनों श्रीरामुलु के तय किए होटल में जाकर आराम करते रहे। राजेंद्र कृष्ण गीत लिखते-फाड़ते रहे और सी रामचंद्र धुनें बनाते-बिगाड़ते और उनसे नाखुश होते रहे। देखते-देखते महीना भर बीतने को आया। मगर एक भी गाना नहीं लिखा गया था। अगले दिन गाने और उनकी धुनें तैयार करके श्रीरामुलु को सुनानी थी। मजबूरी में राजेंद्र कृष्ण ने तुरत-फुरत एक के बाद एक गाना लिखना शुरू किया और सी रामचंद्र ने उनकी धुनें हाथों हाथ तैयार करनी शुरू की। सुबह होते होते राजेंद्र कृष्ण न सिर्फ नौ गाने लिख चुके थे बल्कि सी रामचंद्र उनकी धुनें भी तैयार कर चुके थे, जिनमें एक कव्वाली भी थी। अगले दिन श्रीरामुलु ने सभी गाने सुने और उन्हें पसंद आए।

‘आजाद’ रिलीज हुई और इसके गाने लोगों की जुबान पर चढ़ गए। ये गाने थे- ‘जारी जारी ओ कारी बदरिया…’, ‘राधा न बोले न बोले न बोले रे…’, ‘देखो जी बहार आई बागों में खिली है कलियां…’, ‘कितना हसीं है मौसम कितना हसीं सफर है…’, ‘अपलम चपलम चपलाई रे…’, ‘बल्लिए ओ बल्लिए…’ तथा कव्वाली ‘मरना भी मोहब्बत में किसी काम न आया…।’
राजेंद्र कृष्ण अमीर गीतकार थे। दरअसल 1980 के आसपास घुड़दौड़ में दांव लगाने वाले राजेंद्र कृष्ण और उनके तीन दोस्तों का 46 लाख रुपए का जैकपॉट लगा था। मगर उससे ज्यादा अमीर वह अपने गानों से थे। उनका गाना ‘तुम्ही हो माता पिता तुम्ही हो…’ (मैं चुप रहूंगी) स्कूलों में प्रार्थना गीत के रूप में खूब गाया गया। शिमला नगरपालिका में नौकरी करने वाले राजेंद्र कृष्ण ने लगभग सभी चोटी के संगीतकारों के लिए गाने लिखे थे।

 

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