बॉलीवुड फिल्में कई बार टॉक्सिक रिश्तों को ग्लैमराइज कर देती हैं। खासकर 90s में ऐसी तमाम फिल्में बनी हैं, जहां टॉक्सिक, मैनचाइल्ड और नारसिसिस्ट पुरुष को हीरो दिखाया जाता रहा है। हम बचपन से इसे आइडियलाइज होते देखते आए हैं और कहीं न कहीं हमारे सबकॉन्शस माइंड में ये सब नॉर्मलाइज हो जाता है।

राजा हिंदुस्तानी में टॉक्सिक पार्टनर

‘राजा हिंदुस्तानी’ भी एक ऐसी फिल्म है जहां एक इगोइस्टिक और टॉक्सिक पार्टनर को ग्लैमराइज किया जाता है।

क्या है कहानी?

आरती, मुंबई के एक बड़े बिजनेस मैन की एकलौती बेटी है। वो घूमने के लिए पालमखेत जाती है और वहां उसका सामना राजा नाम के टैक्सी ड्राइवर से होता है। 5 स्टार में जगह नहीं मिलती तो वो राजा के घर चली जाती है। एक दिन जब गुंडे आरती के साथ बदतमीजी करते हैं तो वो आरती के कपड़ों पर सवाल उठाता है।

आरती राजा के गलत बर्ताव के बावजूद खुद माफी मांगती है और धीरे-धीरे दोनों के बीच रोमांस शुरू होता है। शादी के बाद राजा का रूप बिल्कुल बदल जाता है। वह आरती पर पूरा नियंत्रण चाहता है, उसे गिफ्ट लेने या अपने पापा से मिलने तक की आज़ादी नहीं देता।

छलचित्र: ‘बागबान’ ने दिखाई एकतरफा कहानी, राज मल्होत्रा के बेटे-बहू नहीं थे विलेन

राजा के टॉक्सिक बिहेवियर के उदाहरण

राजा शादी के बाद आरती के रोने को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करता। पहले वह कहता था “जब कोई रोता है तो हमें अच्छा नहीं लगता,” और शादी के बाद वह रोती हुई पत्नी को बिल्कुल नजरअंदाज करता है।

जब आरती अपने पापा से एक गिफ्ट लेती है, तो राजा उससे नाराज़ हो जाता है और कहता है कि बिना पूछे गिफ्ट क्यों लिया। यहां भी आरती बाद में राजा से माफी मांगती है और कहती है- अगली बार कुछ ऐसा-वैसा करूं तो मुझे दो थप्पड़ लगा देना।

आरती जब अपने बर्थडे पर अपने पापा के घर जाना चाहती है, तो राजा उसे रोक देता है। आरती समझाती है कि वो हर साल ये दिन पापा के साथ मनाती है तो वो चलता तो है साथ मगर वहां राजा, आरती को एक्साइटेड देखकर भी दुखी हो जाता है।

जब आरती की स्टेपमॉम और मामा उसे भड़काते हैं, तो राजा बिना सच जाने पब्लिकली पार्टी में आरती को अपमानित करता है। वह उसके बाल पकड़कर खींचता है और शराब पीकर बवाल करता है। पहले वह कहता था कि ‘बड़े शहरों में होता होगा ऐसा हमारे यहां तो बहू-बेटियों की इज्जत की जाती है’- लेकिन शादी के बाद खुद अपनी पत्नी को रुलाना और गलत व्यवहार करना उसे बुरा नहीं लगता।

आरती राजा से अपमान सहने के बाद उसे जाने को कहती है, मगर बाद में उसे ही गिल्ट होता है कि उसने ये क्या कर दिया। वो दौड़कर उसे मनाने जाती है मगर राजा जा चुका होता है।

प्रेग्नेंसी के दौरान जहां आरती को सबसे ज्यादा पति की जरूरत थी वो पूरा समय अकेले बिताती है और डिलीवरी भी अकेले ही करानी पड़ती है। इसके बावजूद आरती करवा चौथ में राजा के लिए व्रत करती है और लंबी उम्र की दुआ करती है।

जब राजा को पता चलता है कि आरती और उसका एक बच्चा है, तब भी वह सुलह करने या बच्चे की देखभाल करने की बजाय बच्चा लेकर भागने लगता है। आरती बेहोश होकर गिर जाती है, लेकिन राजा को उसकी चिंता तक नहीं होती और वह उसके ऊपर से गुजरकर निकल जाता है।

क्लाईमैक्स में भी आरती और उसके पिता राजा को समझाने की कोशिश करते हैं और उससे माफी मांगते हैं मगर वो सिचुएशन समझने की बजाय बच्चे की जान रिस्क में डालकर भागता है।

छलचित्र: चश्मा उतरते ही खूबसूरत हो जाती है हीरोइन, कब बदलेगी बॉलीवुड की सोच

90s का नजरिया

उस समय “गरीब लड़का और अमीर लड़की” की कहानी में लड़के के ईगो को ‘स्वाभिमान’ कहकर सही ठहराया जाता था। त्याग और माफी का पूरा जिम्मा औरत पर होता था। फिल्म में दिखाया गया टॉक्सिक व्यवहार युवाओं के दिमाग में नॉर्मलाइज हो जाता है।

एलजीबीटी और अन्य मुद्दे

इस फिल्म में एलजीबीटी समुदाय का भी मजाक उड़ाया गया है। बाल कलाकार कुणाल खेमू से भी अजीब डायलॉग बोलवाए गए हैं।

सिनेमा का मनोवैज्ञानिक असर

मनोविज्ञान और मीडिया विशेषज्ञों के अनुसार, फिल्मों में टॉक्सिक यानी नुकसान पहुंचाने वाले व्यवहार को ग्लैमराइज करना युवाओं को आकर्षित करता है। मिशिगन यूनिवर्सिटी की शोधकर्ता जूलिया आर. लिपमैन ने अपने अध्ययन “I Did It Because I Never Stopped Loving You” में बताया कि लगातार पीछा करना दिखाने वाली फिल्में महिलाओं में ऐसे व्यवहार को स्वीकार करने की आदत बढ़ा सकती हैं।

मनोवैज्ञानिक डॉ. जॉर्ज साइमन कहते हैं कि फिल्में अक्सर नार्सिसिस्टिक लोगों को करिश्माई दिखाती हैं, जिससे लोग अनजाने में उनसे अट्रैक्ट हो जाते हैं।

ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी के शोध के अनुसार, जब दर्शक किसी किरदार से भावनात्मक जुड़ाव महसूस करते हैं, तो वे उनके टॉक्सिक बिहैवियर को भी “सच्चा प्यार” मानकर सही मानने लगते हैं।

इसलिए फिल्मों की जिम्मेदारी है कि वे रिश्तों और व्यवहार को सही तरीके से दिखाएं। नहीं तो छलचित्र की तरह ये फिल्में हमारी सोच में गलत मान्यताओं को बैठा देती हैं और हम अनजाने में टॉक्सिक रिलेशनशिप को नॉर्मल मानने लगते हैं।

‘पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त’, क्या वाकई एंड में सब ठीक हो जाता है | इश्क दर्द और सिनेमा