फिल्म इंडस्ट्री में कई तकनीशियनों और कलाकारों के साथ काम करने के बाद राज कपूर ने महज 24 साल की उम्र में, 1948 में आरके स्टूडियोज की स्थापना की। यहीं से एक फिल्मकार और कहानीकार के रूप में उनकी असली पहचान बननी शुरू हुई। राज कपूर ने समय के साथ अपनी फिल्मों की शैली में बदलाव किया, लेकिन 1950 के दशक में बनी उनकी फिल्मों ने उन्हें हिंदी सिनेमा का एक अग्रणी और दूरदर्शी फिल्ममेकर बना दिया।
आज जब किसी फिल्म के अंत में अगली कहानी का संकेत मिलता है, जब अलग-अलग फिल्मों के किरदार एक-दूसरे की दुनिया में दाखिल होते हैं या जब किसी स्टार का एक किरदार कई फिल्मों में विकसित होता दिखाई देता है, तो दर्शकों के मन में सबसे पहले ‘मार्वल सिनेमेटिक यूनिवर्स’ का ख्याल आता है। लेकिन हिंदी सिनेमा के इतिहास में झांकें तो एक दिलचस्प तथ्य सामने आता है कि राज कपूर ने शायद यह प्रयोग 1950 के दशक में ही कर चुके थे।
हालांकि, यह दावा नहीं किया जा सकता कि राज कपूर ने आधिकारिक तौर पर ‘सिनेमैटिक यूनिवर्स’ बनाया था, क्योंकि उस दौर में ऐसा कोई कॉन्सेप्ट मौजूद नहीं था। लेकिन उनकी कई फिल्मों को एक साथ देखने पर एक ऐसा सिनेमाई संसार उभरता है, जिसमें एक ही विचार और लगभग एक ही किरदार अलग-अलग रूपों में जीवित दिखाई देता है। यही वजह है कि आज कई फिल्म समीक्षक और सिनेमा इतिहासकार राज कपूर की छवि को हिंदी सिनेमा का सबसे शुरुआती सिनेमाई यूनिवर्स मानने की दलील देते हैं।
एक किरदार जिसने बदल दिया भारतीय सिनेमा
1951 में रिलीज हुई ‘आवारा’ सिर्फ एक फिल्म नहीं थी, बल्कि वही फिल्म थी जिसने राज कपूर को दुनिया भर में पहचान दिलाई। इसमें उन्होंने एक ऐसे नौजवान का किरदार निभाया था, जो हालात का मारा हुआ है, लेकिन उसके भीतर अच्छाई और इंसानियत अब भी जिंदा है। यह किरदार गरीबी, अमीरी-गरीबी के फर्क और समाज में होने वाले अन्याय के खिलाफ खड़ा नजर आता है।
‘आवारा’ में दर्शकों ने पहली बार राज कपूर की उस खास छवि को देखा, जो आगे चलकर उनकी पहचान बन गई। फटे-पुराने कपड़े पहनने वाला, संघर्ष करने वाला, लेकिन हमेशा उम्मीद बनाए रखने वाला यह आम आदमी लोगों के दिलों में बस गया। इस किरदार पर मशहूर अभिनेता चार्ली चैपलिन के एक लोकप्रिय किरदार का असर जरूर था, लेकिन राज कपूर ने इसे पूरी तरह भारतीय रंग दिया।
इसमें उस दौर के आम भारतीय की परेशानियां, सपने और संघर्ष साफ दिखाई देते थे। दिलचस्प बात यह है कि ‘आवारा’ की जबरदस्त सफलता के बाद राज कपूर ने इस छवि को बदलने के बजाय अपनी दूसरी फिल्मों में भी आगे बढ़ाया। यही वजह है कि उनकी कई फिल्मों के किरदार एक-दूसरे से जुड़े हुए महसूस होते हैं।
फिर आई ‘श्री 420’ और कहानी आगे बढ़ गई
1955 में ‘श्री 420’ रिलीज हुई। सतह पर देखें तो यह एक अलग फिल्म थी, लेकिन उसका नायक ‘आवारा’ के राजू का ही अगला रूप लगता है। वह फिर गरीब है। फिर सपनों के साथ शहर में आया है। फिर व्यवस्था से टकरा रहा है। फिर नैतिकता और लालच के बीच संघर्ष कर रहा है।
फिल्म विशेषज्ञों का मानना है कि ‘श्री 420’ में राज कपूर का किरदार उनकी आवारा वाली ‘आम आदमी’ की छवि का ही अगला रूप था। यहां भी वह एक साधारण इंसान के संघर्ष और सपनों को पर्दे पर लेकर आए। अगर Marvel में टोनी स्टार्क कई फिल्मों में विकसित होता है, तो राज कपूर के यहां यह विकास ‘राजू’ के रूप में दिखाई देता है।
सुपरहीरो यूनिवर्स नहीं, ‘कॉमन मैन यूनिवर्स’ था
Marvel के सुपरहीरो दुनिया बचाते हैं। राज कपूर का नायक खुद को बचाने की कोशिश करता है। यही इनके बीच सबसे बड़ा अंतर था। राज कपूर के किरदार के पास कोई सुपरपावर नहीं थी। उसके पास सिर्फ उम्मीद थी।
वह उस भारत का प्रतिनिधित्व करता था, जो आजादी के बाद गरीबी, बेरोजगारी, वर्गभेद और नैतिक संकटों से जूझ रहा था। फिल्म इतिहासकार शिवेंद्र सिंह डूंगरपुर के अनुसार, राज कपूर का “ट्रैम्प” अवतार भारतीय आम आदमी का प्रतीक बन गया था।
क्या सचमुच यह बॉलीवुड का पहला सिनेमैटिक यूनिवर्स था?
तकनीकी रूप से नहीं। राज कपूर ने कभी यह घोषणा नहीं की कि उनकी फिल्में एक ही यूनिवर्स का हिस्सा हैं। न कोई साझा टाइमलाइन थी, न पोस्ट-क्रेडिट सीन, न आधिकारिक क्रॉसओवर। लेकिन अगर सिनेमैटिक यूनिवर्स को एक ऐसे संसार के रूप में देखा जाए जहां एक किरदार, एक विचार और एक भावनात्मक निरंतरता कई फिल्मों को जोड़ती हो, तो राज कपूर का “राजू” उस परिभाषा पर खरा उतरता दिखाई देता है।
शायद यही कारण है कि आज, Marvel और DC के दौर में भी, राज कपूर का ट्रैम्प भारतीय सिनेमा के सबसे प्रभावशाली और लंबे समय तक जीवित रहने वाले छवि में गिना जाता है और यही वजह है कि जब हिंदी सिनेमा के इतिहास को पलटकर देखा जाता है, तो लगता है कि सुपरहीरो यूनिवर्स आने से दशकों पहले राज कपूर एक ऐसे ‘कॉमन मैन यूनिवर्स’ की रचना कर चुके थे।
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