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राग देश: जिस फिल्म में स्टार, विवाद या नारीवाद न हो उसकी बात कौन करेगा?

"राग देश" आजाद हिन्द फौज के तीन अफसरों पर अंग्रेजों द्वारा चलाए गए मुकदमे पर आधारित है।
Author August 8, 2017 08:46 am
तिग्मांशु धूलिया की फिल्म राग देश का एक दृश्य। (फाइल फोटो)

जिस फिल्म में स्टार, विवाद या नारीवाद न हो उसका क्या हश्र हो सकता है राग देश इसका एक अच्छा उदाहरण है। पिछले शुक्रवार (28 जुलाई) को रिलीज हुई फिल्म को देखने के लिए नोयडा के एक  मल्टीप्लेक्स में गुरुवार (तीन अगस्त) को पहुंचा तो मॉल के बाहर फिल्म का एक पोस्टर तक नहीं था। जबकि बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड तक की फिल्मों के दैत्याकार पोस्टर मॉल की दीवार पर आने-जाने वालों को वेलकम बोल रहे थे । भारत माता, गऊ माता, देशद्रोह, राष्ट्रगान और तिरंगा पिछले तीन साल से देश में ब्रेकिंग न्यूज बने हुए हैं लेकिन देश की आजादी के लिए जान देने वाले 27 हजार भारतीय सैनिकों की कहानी और उनमें से तीन पर ब्रिटिश हुकूमत द्वारा चलाए गए राजद्रोह के मुकदमे को देखने के लिए हॉल में एक दर्जन से ज्यादा लोग नहीं थे। वो भी तब जब कुछ नारीवादी समीक्षकों को छोड़कर ज्यादातर समीक्षकों ने फिल्म को सकारात्मक रिव्यू दिया। दर्शकों की बेरुखी की एक वजह ये हो सकती है कि फिल्म की कहानी वास्तविक है, काल्पनिक नहीं। फिल्म में छिछोरा रोमांस, फैशनेबल जेंडर जिहाद या अतिरंजित एक्शन सीन नहीं है। लेकिन कोई देखे न देखे ‘राग देश’ की कहानी भारतीय इतिहास का ऐसा पन्ना है जिसे इग्नोर तो किया जा सकता है डिलीट नहीं किया जा सकता।

‘राग देश’ नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिन्द फौज (आईएनए), उसके द्वारा भारत को आजाद कराने के लिए ब्रिटिश सरकार के खिलाफ लड़ी गई लड़ाई  और आईएनए के तीन अफसरों कर्नल प्रेम कुमार सहगल, लेफ्टिनेंट कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों तथा मेजर जनरल शाह नवाज खान पर चलाए गए राजद्रोह और हत्या के मुकदमे की कहानी है। कुणाल कपूर (शाह नवाज), मोहित मारवाह (सहगल), अमित साध (ढिल्लों), मृदुला मुरली (लक्ष्मी स्वामीनाथन) और केनी देसाई (भूलाभाई देसाई) ने फिल्म में मुख्य भूमिका निभायी है। आईएनए का गठन ब्रिटिश भारतीय सेना के उन सैनिकों से हुआ था जिन्होंने जापान के हाथों हारने के बाद आत्मसमर्पण कर दिया था। अंग्रेजों ने भारतीय सैनिकों को जापानियों को रहमोकरम पर छोड़ दिया। जापानियों की मदद से सितंबर 1942 में मोहन सिंह ने इन भारतीय सैनिकों से आजाद हिन्द फौज का गठन किया। बाद में जापानियों ने मोहन सिंह की खुदमुख्तारी से नाराज होकर आईएनए को भंग करा दिया।

अक्टूबर 1943 में नेताजी सुभाषचंद्र बोस के नेतृत्व में एक बार फिर आजाद हिन्द फौज का गठन हुआ। दक्षिण-पूर्वी एशिया के भारतीयों ने इस सेना को तन-मन-धन से समर्थन दिया। जर्मनी, इटली, क्रोएशिया, थाईलैंड समेत सात देशों ने नेताजी की प्रवासी सरकार को मान्यता दे दी। उस समय दुनिया में दूसरा विश्व युद्ध चल रहा था। 1944 में आईएनए ने जापान के सहयोग से ब्रिटिश सेना के खिलाफ युद्ध शुरू किया। जापान पर अगस्त 1945 में अमेरिका द्वारा दो परमाणु बम गिराने के बाद दूसरी आलमी जंग रुक गई। अगस्त 1945 में ही आईएनए के मुखिया नेताजी सुभाष चंद्र बोस का विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया और वो लापता हो गए। हथियार, गोला-बारूद, लड़ाकू विमान, भोजन-पानी और दवाओं के अभाव के साथ संघर्ष कर रहे आईएनए के सिपाहियों पहले ही सभी सुविधाओं से लैस ब्रिटिश फौज से हार गई थी। जापान की हार और बोस के लापता होने ने आईएनए के दोबारा जाग उठने की रही सही उम्मीद खत्म कर दी। भारत को आजाद कराने के लिए ब्रिटिश सेना से लड़ने वाले आईएनए के करीब 27 हजार जवान शहीद हो गए। बचे हुए जवानों ने आत्मसमर्पण कर दिया। सहगल, ढिल्लों और शाह नवाज इन्हीं में शामिल थे।

आईएनए जैसा सैन्य विद्रोह दोबारा न हो इसलिए अंग्रेज सरकार ने सहगल, ढिल्लों और शाह नवाज पर दिल्ली के लाल किले में सार्वजनिक रूप से कोर्ट मार्शल का मुकदमा चलवाया। भूलाभाई देसाई और जवाहरलाल नेहरू जैसे वकीलों ने आईएनए के इन तीन बहादुरों की पैरवी की। सैन्य अदालत ने सहगल, ढिल्लों और शाह नवाज को हत्या और हत्या के लिए उकसाने की कोशिश के आरोप से बरी कर दिया लेकिन अंग्रेज बादशाह के बगावत का दोषी पाते हुए सेना से निकाल दिया। अंग्रेज आईएनए की बढ़ती लोकप्रियता से डर गए थे। वो समझ गए थे कि इन तीनों को सजा दी तो पूरे देश में विद्रोह की आग भड़क उठेगी। अंग्रेजों के डर की एक बड़ी वजह इन तीनों का भारत के तीन बड़े धार्मिक समुदायों (हिन्दू, मुस्लिम और सिख) का होना था। जबकि अंग्रेज आने वाले वक्त में हिन्दू और मुस्लिम के नाम पर भारत विभाजन की बुनियाद रखने वाले थे। और ये सब कैसे हुआ ये जानने के लिए आपको ये फिल्म देखनी होगी। फिल्म की पटकथा, निर्देशन और अभिनय सराहनीय हैं। फिल्म के निर्माता राज्य सभा टीवी के सीईओ गुरदीप सिंह सप्पल हैं। निर्देशन तिग्मांशु धूलिया ने किया। पटकथा और संवाद प्रमोद सिं का है। दुनिया की सर्वश्रेष्ठ ऐतिहासिक फिल्मों से तुलना करने पर ‘राग देश’ में कई कमियां आपको महसूस होंगी लेकिन बॉलीवुड के लेवल से इसका स्तर ऊंचा है, इसमें कोई शक नहीं।

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