जब पहला प्यार जिंदगी में दस्तक देता है तो साथ में ढेर सारी उलझनें भी लेकर आता है। अचानक फोन की स्क्रीन सबसे ज्यादा जरूरी लगने लगती है, सामने वाले की हर बात का मतलब निकाला जाने लगता है और दोस्तों की सलाह भी रिश्ते में ज्यादा कन्फ्यूज भर देती है। ‘प्रेम कीटाणु’ इसी उम्र और इसी एहसास की कहानी है। लेकिन अगर आप इसे सिर्फ एक सीधी-सादी प्रेम कहानी समझ रहे हैं तो गलत हैं।
डायरेक्टर अपूर्व सिंह कार्की की इस पिक्चर में रोमांस के साथ दोस्ती, फैमिली, करियर और बड़े होने की जिम्मेदारियों को भी जगह दी है। यही वजह है कि फिल्म में हल्के-फुल्के पलों के साथ कुछ ऐसे इमोशनल मोमेंट्स भी आते हैं, जो कहानी को थोड़ी ज्यादा गहराई देते हैं।
क्या है फिल्म की कहानी?
फिल्म की कहानी विशाल (वीर पहाड़िया) नाम के लड़के पर आधारित है। विशाल एक ऐसा लड़का है, जिसे जिंदगी को बहुत सीरियस से लेने की आदत नहीं है। क्लास में पीछे बैठना, दोस्तों के साथ मस्ती करना और बिना ज्यादा सोचे दिन निकाल देना उसकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है। लेकिन फिर उसके जीवन में सुहानी (आफिया सैयद) आती है।
सुहानी एक समझदार, आत्मविश्वासी और अपने लक्ष्य को लेकर पक्की लड़की है। विशाल और सुहानी दोनों बहुत अलग है, और शायद इसीलिए एक-दूसरे के प्रति अट्रैक्ट हो जाते है, और यहीं से विशाल की आसान-सी जिंदगी थोड़ी उलझने लगती है। मामला तब और दिलचस्प हो जाता है जब सुहानी के कलीग रंजीत (अपारशक्ति खुराना) की एंट्री होती है। यहां से कहानी एक मजेदार लव ट्राएंगल में बदल जाती है।
अपारशक्ति खुराना ने रंजीत के किरदार में अपनी कॉमिक टाइमिंग का अच्छा इस्तेमाल किया है। हालांकि रंजीत को सिर्फ ऐसा किरदार नहीं बनाया गया है, जो हीरो और उसकी प्रेम कहानी के बीच खड़ा हो। उसका अपना अंदाज है और सुहानी को पसंद करने की अपनी वजहें हैं।
यही बात इस लव ट्राएंगल को दिलचस्प बनाती है। फिल्म यह सवाल भी उठाती है कि प्यार में सिर्फ अपनी फीलिंग्स काफी नहीं होतीं, सामने वाले की पसंद और उसकी आजादी भी उतनी ही मायने रखती है। विशाल का लगातार यह सोचते रहना कि सुहानी उसके बारे में क्या महसूस करती है, कहानी के कई मजेदार और कई मासूम पलों को जन्म देता है।
परफॉरमेंस
वीर पहाड़िया ने विशाल को बहुत अच्छे अंदाज में निभाया है। शुरुआत में विशाल एक बेफिक्र लड़का दिखाई देता है, लेकिन कहानी आगे बढ़ने के साथ उसके अंदर बदलाव आने लगता है। सुहानी के लिए उसकी फीलिंग्स के साथ-साथ उसे अपने भविष्य और करियर के बारे में भी सोचना पड़ता है।
आफिया सैयद ने ‘प्रेम कीटाणु’ से अपना बॉलीवुड डेब्यू किया है। वह फिल्म में ताजगी लेकर आती हैं। सुहानी के किरदार में उनका आत्मविश्वास और सादगी अच्छी लगती है। वीर और आफिया की ऑनस्क्रीन केमिस्ट्री भी अच्छी है। दोनों के बीच के रोमांटिक सीन में वह झिझक और मासूमियत है, जो उनकी पहली मोहब्बत को खास बनाती है।
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फिल्म की एक और खास बात विशाल और उसके रूममेट (निखिल विजय) की दोस्ती है। दोनों के बीच होने वाली नोकझोंक और बातचीत कहानी में लगातार हल्का माहौल बनाए रखती है। विशाल जब भी अपनी लव लाइफ को लेकर परेशान होता है, उसका रूममेट सलाह देने के लिए तैयार रहता है।
लेकिन उसकी सलाह हर बार काम की हो, यह जरूरी नहीं है। रिश्तों को लेकर उसकी अजीबो-गरीब थ्योरी और विशाल की परेशानियों पर उसके रिएक्शन आपको हंसाते हैं। दो दोस्तों के बीच की वह रोजमर्रा वाली मस्ती महसूस होती है, जो कहानी को ज्यादा रिलेटेबल बनाती है।
पिक्चर में कई इमोशनल पल
राकेश बेदी, इस फिल्म में सुहानी के पिता के किरदार में अपनी छाप छोड़ते हैं। खासकर रंजीत का उन्हें इंप्रेस करने की कोशिश करना कुछ मजेदार पल पैदा करता है। लेकिन फिल्म का पारिवारिक पक्ष सिर्फ कॉमेडी तक सीमित नहीं है।
विशाल और उसके माता-पिता का रिश्ता कहानी को एक अलग एमोशनल लेयर देता है। यहां कोई बड़ा ड्रामा या फिल्मी झगड़ा नहीं है, बल्कि छोटे-छोटे पलों के जरिए परिवार के रिश्तों को दिखाया गया है।
विशाल को धीरे-धीरे एहसास होता है कि उसके माता-पिता के साथ उसके रिश्ते में जो दूरियां हैं, उनके पीछे सिर्फ उनकी गलतियां नहीं बल्कि उसकी अपनी सोच भी है। ‘प्रेम कीटाणु’ आपको समझाती है कि हर परिवार में प्यार ‘आई लव यू’ कहकर नहीं जताया जाता। कई बार चिंता, सलाह, डांट और छोटी-छोटी बातों में भी प्यार छिपा होता है।
अपूर्व सिंह कार्की ने फिल्म की टोन को हल्का और यूथफुल रखा है। स्क्रीनप्ले में रोमांस, कॉमेडी, दोस्ती और परिवार को एक साथ पिरोने की कोशिश की गई है। इसका फर्स्ट हाफ हल्का-फुल्का और कॉमेडी भरा है। हालांकि सेकेंड हाफ थोड़ा ढीला पड़ जाता है। कुल मिलाकर ‘प्रेम कीटाणु’ को एन्जॉय किया जा सकता है।
