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नृत्यः कथक का नया कलेवर

कथक नृत्यांगना प्रतिभा सिंह ने कथक नृत्य की बारीकियों को कई गुरुओं के सानिध्य में सीखा है।

कथक नृत्यांगना प्रतिभा सिंह

कथक नृत्यांगना प्रतिभा सिंह ने कथक नृत्य की बारीकियों को कई गुरुओं के सानिध्य में सीखा है। उन्होंने पंडित बिरजू महाराज व पंडित जयकिशन महाराज से लखनऊ घराने की बारीकियों को सीखा। इसके अलावा, उन्होंने बलराम लाल और डॉ नागेंद्र प्रसाद से भी कला की बारीकियों को समझा। नृत्यांगना प्रतिभा सिंह ने नृत्य के साथ कला को एक बड़े कैनवास में देखा और समझा है। उन्होंने पिछले वर्ष किन्नरों के गायन व नर्तन को आधार बना कर किन्नर महोत्सव का आयोजन किया था। यह काफी चर्चित रहा।
पिछले दिनों मेघदूत थियेटर में कला मंडली की ओर से नृत्य नाटिका संध्या का आयोजन किया गया। कला मंडली अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने का प्रयास कर रही है। इसकी संस्थापिका नृत्यांगना प्रतिभा सिंह है। इस समारोह में उन्होंने सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की अमर कृति ‘राम की शक्ति पूजा’ पर आधारित नृत्य नाटिका ‘राम की शक्ति पूजा’ पेश की। इसमें उन्होंने कई चाक्षुष कलाओं का संयोजन किया था। उन्होंने कथक नृत्य के साथ माइम, छऊ और कठपुतलियों का प्रयोग किया था। काव्य के अंश के वाचन के जरिए नृत्य नाटिका की कथा को पिरोया गया था।

कथक नृत्यांगना प्रतिभा बताती हैं कि राम की शक्ति पूजा एक सर्वकालिक रचना है। यह हर समय प्रासंगिक है। हमारे समाज में हर प्रवृत्ति के लोग रहते हैं। इसलिए हमेशा अधर्म या असत्य के खिलाफ धर्म या सत्य की विजय की आकांक्षा लोगों के मन में पलती है। राम की पूजा तो मौलिक कल्पना और चिंतन है। इसके जरिए कोई भी व्यक्ति देवी से उपासन कर शक्ति और आत्मबल पाने का प्रयास करता है। मैंने अपनी नृत्य नाटिका के जरिए यही संदेश देने का प्रयास किया है।

वे मानती हैं कि सूर्यकांत त्रिपाठी की इस काव्य रचना में देश की स्वतंत्रता के लिए भी एक तरह से प्रेरित करने की कोशिश की गई थी। हमारे जीवन का संघर्ष तो चिरंतन और निरंतर है। मैं उसी भाव से प्रेरित हूं। नृत्य रचना राम की शक्ति पूजा में प्रतिभा सिंह ने कथक के तोड़े, टुकड़े और तिहाइयों को कथा के अनुरूप पेश किया। वहीं काव्य के अंशों पर भाव अभिनय भी पेश किया। जबकि, माइम और छऊ के कलाकारों ने राम और रावण की सेना के द्वंद्व को बखूबी प्रस्तुत किया। इसके अलावा, नृत्य नाटिका में रावण के दस सिर के प्रतीक स्वरूप घड़ों का प्रयोग किया गया था। प्रस्तुति के अंत में रावण के वध को प्रतीक रूप में उन घड़ों को चटकाया गया। यह प्रतीकात्मक सोच काफी रचनात्मक प्रतीत हुई। वैसे भी भारतीय दर्शन की मान्यता है कि जीव शरीर माटी स्वरूप है। काव्य की पंक्तियों पर भावों की अभिव्यक्ति दृश्यानुकूल थी। इस प्रस्तुति में लगभग 45 कलाकारों ने शिरकत की।

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