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मुखाग्नि फिल्मः दहेज की विडंबनाओं से उपजा सिनेमाई कोलाज

बेटा पैदा होने पर कर क्यों देना होता है..यह तो गलत बात है न मां। बेटे को पैदा तो एक बेटी ही करती है न...यह बीमा क्या होता है...बीमा के पैसे से क्या फायदा होता है..।

Author January 19, 2018 1:55 AM
दिल्ली के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में युवा फिल्मकार प्रकाश के मस्तान की फिल्म ‘मुखाग्नि’ का प्रदर्शन हुआ तो दिल्ली की ठिठुरन भरी ठंड में प्रदर्शन कक्ष की सभी कुर्सियां भर गई थीं। फिल्म की शुरुआत में एक कमरे की खिड़की से लटके तीन लड़कियों के पैर और खिड़की के बाहर रोती हुई लड़की एक सिहरन पैदा कर देती है।

बेटा पैदा होने पर कर क्यों देना होता है..यह तो गलत बात है न मां। बेटे को पैदा तो एक बेटी ही करती है न…यह बीमा क्या होता है…बीमा के पैसे से क्या फायदा होता है..।’ सात साल का बच्चा दहेज और बीमा का समीकरण समझ जाता है और उसके बाद जो कदम उठाता है वह सिनेमा के परदे पर सामंती समाज का स्याह रचता है। आज भी हमारे समाज का एक बड़ा वर्ग वैसा महाजन बना बैठा है जो औरतों की कोख से बेटी जनने का लगान वसूलता है। ‘दहेज’ एक ऐसा शब्द है जिसे मुख्यधारा की फिल्मों में अभी बिकाऊ मसाला नहीं माना जाता। लेकिन जब अपनी मिट्टी से उठा फिल्मकार अपनी मिट्टी की तरफ देखेगा तो वह इस समस्या से मुंह नहीं चुरा सकता और वह परदे पर अपना पहला सृजन उस कुप्रथा के नाम करता है जिसकी आग में बिहार का एक बड़ा तबका जल रहा है।

दिल्ली के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में युवा फिल्मकार प्रकाश के मस्तान की फिल्म ‘मुखाग्नि’ का प्रदर्शन हुआ तो दिल्ली की ठिठुरन भरी ठंड में प्रदर्शन कक्ष की सभी कुर्सियां भर गई थीं। फिल्म की शुरुआत में एक कमरे की खिड़की से लटके तीन लड़कियों के पैर और खिड़की के बाहर रोती हुई लड़की एक सिहरन पैदा कर देती है। फंदे पर झूली तीन लाशों के बाद फ्लैशबैक में गई फिल्म हमें उस नन्ही लाश का सामना कराती है जिसके जरिए प्रकाश पूरे सामंती समाज को तमाचा लगाने में कामयाब रहे हैं। ‘मुखाग्नि’ कहानी है एक परिवार की जिसमें एक बेटे की चाहत में चार बेटियां पैदा कर ली गर्इं। पिता दहेज के कारण बेटियों की शादी नहीं कर पाता लेकिन अपनी सारी जमा पूंजी बेटे का बीमा कराने में लगा देता है। उसे लगता है कि बेटियों की शादी नहीं हो पा रही है तो क्या बेटे का भविष्य सुरक्षित रहेगा। लेकिन इन बेटियों को पैदा करने वाली मां को अपनी बेटियों की चिंता खाए जाती है। आज जब बाप दहेज के कारण अपनी बेटियों की शादी नहीं कर पा रहा है तो मां उस दिन को भी याद कराती है जब वह परिवार नियोजन का आॅपरेशन करवाने के लिए अस्पताल गई थी और पति ने इस सामंती मानसिकता के तहत आॅपरेशन के कागज पर दस्तखत नहीं किए थे कि तुम्हें खाने-पीने की कमी है क्या जो आॅपरेशन करवाने चली आई।

प्रकाश परिवार से लेकर समाज तक की सामंती मानसिकता को जिस तरह दृश्यों और संवादों में समेटते हैं उससे उनका एक वृहत्तर नजरिया दिखता है। स्त्री की ओर से परिवार नियोजन की पहलकदमी मर्द को अपनी मर्दानगी पर हमला दिखता है। वहीं एक सात साल का बच्चा जिसे नए जूते मिल रहे हैं जो स्कूल जा रहा है वह अपने जीवन की उपयोगिता पर सवाल उठाता है। जो बीमा उसके जीवन को सुरक्षित करने के लिए किया जा रहा था उसी के जरिए उसने अपनी बहनों की शादी कराने की ठानी। अभी वह बच्चा है और सामंती समाज का मर्द नहीं बना है तो उसकी संवेदनशीलता अपनी मां और बहनों के साथ है। वह अपने बीमे की रकम से बहनों के लिए सुहाग लाना चाहता है तो भाई का सुसाइड नोट पढ़ कर बहन कहती है कि ‘कफन के पैसों से सुहाग का जोड़ा नहीं बनने देंगे’। फिल्म के अंत में बिछती लाशों से प्रकाश दहेज से उपजी विडंबनाओं का पूरा कोलाज रच जाते हैं। मां का संवाद गूंजता है ‘बेटा आग नहीं देगा तो आप जलेंगे नहीं क्या’। बेटे का बाप दहेज की रकम सुन कर ताना मारता है, ‘इतने पैसे में तो दो दांत का बछड़ा नहीं मिलेगा’। इन विडंबनाओं के अंत में पूरे परिवार में बचती है मां और एक छोटी बेटी। नन्ही बच्ची पिता को आग देती है और वह जल भी जाता है। एक लड़की की ‘मुखाग्नि’ से सब जल जाते हैं।

आज जब बिहार सरकार दहेज कुप्रथा के खिलाफ अभियान चला रही है, वैसे समय में प्रकाश अपनी एक सरोकारी फिल्मकार की भूमिका अदा करते हैं। यह तो एक तीन घंटे की फिल्म की पटकथा है तो आपने इसके लिए शॉर्ट फिल्म का विकल्प क्यों चुना। इसके जवाब में प्रकाश कहते हैं कि मैं जिस माहौल से आता हूं वहां फिल्मकार बनने का संघर्ष एक बेटी के लिए दहेज जमा करने जैसा ही है। नई राह पर चलने के लिए आपको अपनी ऊर्जा से ज्यादा संघर्ष करना पड़ता है। इसलिए मैंने अपनी पहली फिल्म के लिए वही विषय चुना जिससे हमारा समाज संघर्ष कर रहा है। प्रकाश ने बतौर निर्देशक बाल कलाकार ध्रुव चौहान से जो काम लिया है वह काबिले तारीफ है। फिल्म के संवाद भी प्रकाश ने ही लिखे हैं। कैलाश खेर और सुरेश वाडेकर का गाया गीत फिल्म के विषय से सीधे तौर पर जोड़ता है। फिल्म के प्रोड्यूसर अभिषेक मालू हैं।

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