‘मैं अटल हूं’ और ‘तमाशा’ जैसी फिल्मों में काम कर चुके अभिनेता पीयूष मिश्रा ने हाल ही में अपने मुश्किल भरे बचपन, माता-पिता के साथ अपने रिश्तों के बारे में बात की। उन्होंने बताया कि उनका बचपन भावनात्मक रूप से काफी मुश्किल भरा था। सिर्फ इतना ही नहीं, उन्होंने यह बताया कि एक पिता के तौर पर वे हमेशा पूरी तरह से अपने बच्चों के साथ मौजूद नहीं रह पाए। चलिए जानते हैं कि अपनी निजी जिंदगी के बारे में उन्होंने क्या कहा।
शुभांकर मिश्रा के साथ बात करते हुए पीयूष ने कहा, “मेरे बचपन का मुझ पर इतना असर था कि मुझे उससे खुद को अलग करना पड़ा। मैं उसे अपने साथ आगे नहीं ले जा सकता था। जब तक मैं उससे आजाद नहीं हुआ, तब तक जिंदगी में आगे बढ़ पाना संभव नहीं था। मेरा बचपन उलझनों से भरा था और मेरे अंदर हीन भावना बनी रहती थी। मुझे अपने माता-पिता से वह नहीं मिल पाया, जिसकी मैं तलाश कर रहा था।”
इसके आगे उन्होंने कहा, “मेरे माता-पिता की समझ सीमित थी, इसलिए मुझे वह दिशा-निर्देश नहीं मिल पाए, जो मुझे मिलने चाहिए थे। लोग अक्सर अपने पिता को मार्गदर्शक, लगभग भगवान जैसी शख्सियत के रूप में देखते हैं। मुझे ऐसा कभी महसूस नहीं हुआ। बल्कि, मेरा अनुभव बिल्कुल उल्टा रहा। मैंने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा उन पैटर्न्स को भूलने और उनसे बाहर निकलने में बिताया।”
माता-पिता के खिलाफ जाते थे पीयूष
मिश्रा ने स्वीकार किया कि वह अक्सर जानबूझकर अपने माता-पिता के खिलाफ जाते थे। उन्होंने कहा, “मैं जानबूझकर वही करता था जो उन्हें पसंद नहीं था। मैंने अपने पिता से यह तक कह दिया था कि वह गलत हैं- उन्हें बच्चे को पालना नहीं आता और उन्होंने अपने बच्चे की परवरिश गलत तरीके से की है।”
पीयूष ने आगे कहा, “जिन मूल्यों के साथ मेरी परवरिश हुई, उनमें कई खामियां थीं- जैसे छल-कपट, हर समय समझौता करना, टकराव से बचना और बस किसी तरह गुजारा करने के लिए सावधानी से जीना। मैं अब खुद को उनसे दूर कर पाया हूं। जैसे-जैसे मैंने उन मूल्यों को छोड़ा, मुझे एहसास हुआ कि जो जिंदगी मैं जी रहा था, वह वास्तव में मेरी अपनी नहीं थी।”
बच्चों पर नहीं उठाया कभी हाथ
पीयूष मिश्रा ने कहा, “मेरा मानना है कि मैं एक बहुत अच्छा पिता हूं। मैंने अपने बच्चों पर कभी हाथ भी नहीं उठाया। मैंने हमेशा उन्हें वह करने की इजाजत दी जो वे करना चाहते थे, क्योंकि मुझे जिंदगी में वह करने का मौका कभी नहीं मिला जो मैं करना चाहता था। शुरुआती पांच सालों तक अपने बच्चे के साथ किसी राजकुमार जैसा बर्ताव करें। पांच से पंद्रह साल की उम्र तक उनके साथ किसी नौकर जैसा बर्ताव करें। पंद्रह साल के बाद उन्हें आजाद छोड़ दें। तब तक जो संस्कार आपने उनमें डाले होंगे, वही उन्हें सही राह दिखाएंगे।”
परिवार पर नहीं दिया ज्यादा ध्यान
वहीं, उन्होंने यह भी कहा कि असल में मेरी पत्नी ने ही उनकी परवरिश की है। मैं लापरवाह था और अक्सर अपनी ही मुश्किलों में उलझा रहता था। मैंने अपने परिवार पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। मेरी पत्नी बहुत सजग थी और उसने बच्चों का बहुत अच्छे से ख्याल रखा।
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