शाहरुख खान ‘ओम शांति ओम’ में जब कहते हैं- ”फिल्मों की तरह हमारी जिंदगी में भी अंत में सब ठीक हो जाता है और अगर ठीक ना हो तो वो एंड नहीं है, पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त।”- तो हम सब इस बात पर पूरा यकीन कर लेते हैं। लेकिन क्या सच में ऐसा होता है?

सिनेमा हमें उम्मीद देता है कि अंत में सब ठीक हो जाता है, लेकिन क्या रियल लाइफ भी ऐसे चलती है? क्या वाकई जिंदगी में हैप्पी एंडिंग होती है, या कभी-कभी जीवन सिर्फ इंटरवल की तरह अटक कर रह जाता है?

सिनेमा हमें सिखाता है कि सब सही करो, अंत में सब ठीक होगा। लेकिन रियल लाइफ कई बार बायस्ड लगती है क्योंकि हम सब सही करते हैं, फिर भी कुछ ठीक नहीं होता।

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इसकी एक बड़ी वजह होती है हमारे दिमाग की वायरिंग। हमारे दिमाग को क्लोज़र चाहिए होता है। Psychology में इसे Need for Cognitive Closure कहा जाता है। हमारा दिमाग अधूरी कहानियों, अनसुलझे रिश्तों, बिना जवाब के खत्म हुई चीज़ों में अटक जाता है।

सिनेमा देता है क्लोज़र

सिनेमा हमें क्लोज़र देता है, इसलिए दिमाग को सुकून मिलता है। हैप्पी एंडिंग हो या सैड एंडिंग, कम से कम अंत होता है, हमें जवाब मिलता है। मगर रियल लाइफ में कई सवाल अटके रहते हैं, हमारी कई कहानियां बिना जवाब के खत्म हो जाती हैं।

कोई माफी मांगे बिना चला गया। कोई सच बताए बिना रिश्ता तोड़ गया। और हम एंड क्रेडिट्स तक बैठकर इंतज़ार करते रहे।

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हमें लगता है कि हम इंटरवल में फंसे हैं… लेकिन क्या आपको पता है कि आप भी अपनी जिंदगी को क्लोज़र दे सकते हैं? हम गलती यहां करते हैं कि हम दूसरों से क्लोज़र मांगते हैं। अपनी जिंदगी के हीरो आप खुद हैं, तो क्लोज़र भी आपको खुद को देना होगा। जब तक आप किसी और से उम्मीद करते रहेंगे, आपको निराशा हाथ लगेगी। अगर आप खुद को क्लोज़र देंगे, तो आप अपनी लाइफ भी आसान बना लेंगे।

यानी जिंदगी ओपन फिल्म की तरह होती है, जिसकी एंडिंग आपको खुद तय करनी होती है।

आप दूसरे के व्यवहार को कंट्रोल नहीं कर सकते, लेकिन अपनी कहानी की मीनिंग बदल सकते हैं। शायद जिंदगी हमें हैप्पी एंडिंग नहीं, बल्कि खुद को संभालने की ट्रेनिंग देती है।

क्या कर सकते हैं

मनोविज्ञान ने हमें कुछ टूल दिए हैं जो इतना आसान हैं कि आप सोच भी नहीं सकते। हम बचपन से सुनते आए हैं कि समस्याएं लिख डालिए- जिसे जर्नलिंग करना कहते हैं। आपको लगता होगा कि जर्नलिंग से क्या होगा… लेकिन लिखने की वजह से आप खुद को जवाब दे पाएंगे।

हमारा दिमाग इस तरह से वायर्ड है कि जब भी हम कोई समस्या लिखते हैं, तो अंत में समाधान भी खुद ही लिखते हैं। और आप नोटिस करेंगे कि जब भी लिखकर आप अपने थॉट्स डंप करते हैं, तो अंत में आप खुद पॉजिटिव लिखने लगते हैं।

James Pennebaker की रिसर्च बताती है:

  • लिखने से emotional processing बेहतर होती है।
  • दिमाग खुद meaning बनाने लगता है।
  • इसलिए अंत में भाषा अपने आप ज्यादा स्पष्ट और शांत हो जाती है।

जिंदगी 3 घंटे की फिल्म नहीं है, जिसमें एक ही टॉपिक चल रहा हो, बल्कि किसी टीवी सीरियल की तरह होती है, जहां एक प्रॉब्लम सॉल्व होने से पहले दूसरी की भूमिका बनने लगती है और कई बार तो पहली सॉल्व ही नहीं हुई रहती है- वो वैसी ही ओपन पड़ी रहती है।

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कैसे कर सकते हैं ओपन लूप्स को बंद

मनोविज्ञान कहता है कि इन ओपन लूप्स को बंद करना जरूरी है। अधूरी चीज़ें दिमाग में ज्यादा घूमती हैं- इसी को Zeigarnik Effect कहते हैं। आप अपने थॉट्स लिखकर, मेडिटेट करके या फिजिकल एक्टिविटी करके इन लूप्स को शांत कर सकते हैं।

मतलब, लाइफ में हैप्पी एंडिंग हो या ना हो, लेकिन जीतना हमारे हाथ में होता है। शायद हमारी जिंदगी हमें ये सिखाती है कि हैप्पी एंडिंग हो या ना हो, हम खुद को हर वक्त, हर हाल में पकड़कर संभालकर रख सकते हैं।

जब हम दर्द में होते हैं, तो हम एक उम्मीद को पकड़ते हैं। और सिनेमा भी हमें उम्मीद देता है।