फिल्म समीक्षा 'फैंटम': पाकिस्तान से फिल्मी बदला - Jansatta
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Film Review ‘फैंटम’: पाकिस्तान से फिल्मी बदला

Phantom Film Review: जिसे भारत में 26/11 कहा जाता है (2008 का वह हादसा जब पाकिस्तानी आतंकवादियों ने मुंबई के ताज होटल सहित कुछ ठिकानों पर हमला किया था और जिसमें कई लोगों के अलावा पुलिस अधिकारी भी शहीद हुए थे)

Author नई दिल्ली | August 30, 2015 4:10 PM
Phantom Film Review: निर्देशक-कबीर खान, कलाकार-सैफ अली खान, कैटरीना कैफ, सोहेला कपूर, सव्यसाची मुखर्जी।

निर्देशक-कबीर खान, कलाकार-सैफ अली खान, कैटरीना कैफ, सोहेला कपूर, सव्यसाची मुखर्जी

जिसे भारत में 26/11 कहा जाता है (2008 का वह हादसा जब पाकिस्तानी आतंकवादियों ने मुंबई के ताज होटल सहित कुछ ठिकानों पर हमला किया था और जिसमें कई लोगों के अलावा पुलिस अधिकारी भी शहीद हुए थे) की चर्चा अक्सर होती है और भारत-पाकिस्तान के बीच बातचीत की हर संभावना-आशंका के बीच वह मसला उठता है। अक्सर यह सुनने को आता है कि उस हमले में मारे गए लोगों को इंसाफ नहीं मिला है। वह इंसाफ क्या होगा यह बहसतलब है, लेकिन फिलहाल उसका फिल्मी इंसाफ हो गया है।

कबीर खान की फिल्म ‘फैंटम’ एक तरह से फिल्मी पर्दे पर भारत के खिलाफ पाकिस्तान की उस आतंकवादी कार्रवाई का बदला है। हुसैन जैदी की किताब ‘मुंबई अवेंजर्स’ पर बनी इस फिल्म का ताना-बाना हालीवुड की ‘मिसन इम्पॉसिबल’ कड़ी की फिल्मों जैसी है। हालांकि कई फर्क हैं। सबसे बड़ा तो यही कि टॉम क्रूज (मिशन इम्पॉसिबल के नायक) जैसा दम सैफ अली खान में नहीं है।

सैफ ने दानियाल खान के नाम के एक शख्स का किरदार निभाया है जो भारतीय गुप्तचर एजंसी रॉ की तरफ से अमेरिका जाकर डेविड कोलमेन हेडली को खत्म कर देता है और लंदन में एक अन्य पाकिस्तानी को भी, जो 26/11 की साजिश में शामिल था। इसमें उसका साथ देती है नवाज (कैटरीना कैफ)। आखिर में दानियाल के निशाने पर हैं हैरिस सईद ( यह किरदार हाफिज सईद की तरह है) और उमवी (जखीउर हमान लखवी जैसा)।

दानियाल और नवाज की जोड़ी उन दोनों को खत्म कर देती है। यह सब इतना सरल लगता है कि दर्शक को महसूस होता है कि आखिर हकीकत में भारतीय खुफिया एजंसियां इतना सरल काम क्यों नहीं कर देतीं? जाहिर है कि फिल्म में कई तरह के सरल नुस्खे हैं। इसमें सोहेला कपूर ने ऐसी पाकिस्तानी मां का किरदार निभाया है जिसका जवान बेटा आतंकवादियों (लश्कर ए तैयबा) के साथ रहने की वजह से मारा गया। वह दानियाल और नवाज का साथ देती है और फिल्म के लगभग अंत में जब पाकिस्तानी सैनिक उससे पूछते हैं, तुमने ऐसा क्यों किया तो वह कहती है, ‘पाकिस्तान की खातिरह्ण। यानी ऐसे पाकिस्तानी भी यहां दिखाए गए हैं तो आतंकवाद के खिलाफ हैं।

फिल्म दर्शकों को लंदन और शिकागो के अलावा सीरिया और पाकिस्तान की सैर करा देती है। दानियाल और नवाज का पाकिस्तान जाना तो समझ में आता है क्योंकि वह कहानी की मांग है। लेकिन सीरिया किसलिए? क्या सिर्फ इसलिए कि वहां के गृह युद्ध के कुछ दृश्य दिखा सकें? लेकिन इससे कहानी लंबी तो होती है, लेकिन उसका कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता है।

फिल्म में दानियाल और नवाज के बीच रोमांटिक रिश्ता बनता है। लेकिन उसके दृश्य ज्यादा नहीं हैं। सैफ अली खान के एक्शन वाले दृश्य भी सामान्य हैं। और अगर निर्देशक ने उन पर खास काम किया होता तो शायद ये और बेहतर हो जाते। जिन्हें 26/11 को लेकर पाकिस्तान से मलाल है उन्हें यह थोड़ा मनोवैज्ञानिक संतोष देगी कि वास्तविक रूप से न सही, लेकिन फिल्मी तरीके से बदला तो ले लिया गया।

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