‘एक ही चीज है जो नहीं बदलती है पतियों की फितरत…’ आयुष्मान खुराना, रकुल प्रीत सिंह, वामिका गब्बी और सारा अली खान की फिल्म ‘पति, पत्नी और वो दो’ का टीज़र आज रिलीज हुआ है। इसे देखते ही सबसे पहला सवाल यही उठता है- क्या फिल्में सिर्फ समाज का आईना होती हैं या फिर उसे इंफ्लुएंस भी करती हैं।

भारत में सिनेमा हमेशा से रिश्तों और प्यार को बड़े पर्दे पर अलग-अलग तरीकों से दिखाता आया है। हमारे यहां तो लोग प्यार का सबक भी फिल्मों से ही सीखते हैं और सिनेमा से बहुत हद का प्रभावित होते हैं।

फिल्म स्टडीज़ जैसे Gerbner’s Cultivation Theory में यह माना जाता है कि मीडिया लंबे समय में सोच को प्रभावित कर सकता है, इसका सीधा और तुरंत असर भले नहीं होता है मगर धीरे-धीरे फिल्में सामाजिक धारणाओं और सोच को आकार देती हैं।

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यहां ‘पति, पत्नी और वो’, ‘घरवाली बाहरवाली’, ‘बीवी नंबर 1’, ‘साजन चले ससुराल’ जैसी फिल्मों में अक्सर पुरुषों के एक्स्ट्रामैरिटल रिलेशनशिप को या तो गलती के तौर पर दिखाया गया या फिर हालात की मजबूरी बताकर पेश किया गया। और अपने लिए आवाज उठाने वाली महिला को कई बार पुराने सिनेमा में निगेटिव शेड में दिखाया गया।

आज के समय में, जब रिश्तों को लेकर लोगों की सोच पहले से ज्यादा कॉम्प्लिकेटेड हो रही है, वहीं दूसरी तरफ डेटिंग और रिलेशनशिप से जुड़े नए ऐप्स भी सामने आ चुके हैं- जिनमें से कुछ खास तौर पर शादीशुदा लोगों के लिए बनाए गए हैं। ऐसे में जब समाज में पहले से ही चीटिंग और रिश्तों की अस्थिरता को लेकर इतनी चर्चाएं हैं, उस वक्त इस तरह की फिल्में सवाल तो खड़े करती हैं।

मीडिया रिसर्च के अनुसार, दर्शक फिल्मों को अपनी निजी सोच, अनुभव और सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर अलग-अलग तरीके से समझते हैं। इसलिए जरूरी नहीं है कि इस तरह के सिनेमा से लोग सीधे तरह से इंस्पायर होकर चीटिंग करने लगेंगे मगर इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि अगर किसी के मन में ऐसे विचार हैं तो ऐसी फिल्में उन विचारों को बढ़ावा जरूर दे सकती हैं।

टीज़र की शुरुआती लाइन ही है- ‘एक ही चीज है जो नहीं बदलती, पतियों की फितरत’ और इसका अंत यह कहकर होता है कि ‘पतियों का यूनिवर्स 15 मई 2026 को दिखेगा’, ये इस बात की ओर इशारा करता है कि फिल्म इस नैरेटिव को आगे बढ़ा रही है कि पति और मर्द तो ऐसे ही होते हैं।

यानी कि फिल्म ये पहले से ही नॉर्मलाइज कर रही है कि पतियों का यूनिवर्स है, जहां पतियों की फितरत नहीं बदलती है। इस तरह से ये लोगों की सोच को भी शेप कर रही है- पति तो ऐसे ही होते हैं… पत्नियां तो अंत में माफ कर देती हैं। मर्दों की तो फितरत ही होती है कि पत्नी के अलावा भी दूसरी अच्छी लगती हैं।

अभी हाल ही में मशहूर कोरियोग्राफर शक्ति मोहन ने भी एक इंटरव्यू में कहा था कि जब उन्हें 3 साल के रिलेशनशिप में चीटिंग मिली तो उनकी मां ने कहा था कि लड़का अच्छा है, और लड़के तो ऐसे ही होते हैं, तुम माफ करके उसके साथ आगे बढ़ो।

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यानी कि ये सोच भीतर तक बैठ चुकी है कि लड़के तो ऐसे ही होते हैं… उन्हें चीटिंग के लिए माफ किया जा सकता है।

इस वजह से भी ये सवाल उठते हैं- अगर साल 2026 में भी इसी तरह की फिल्में बनती रहेंगी… जहां पुरुषों के एक्सट्रामैरिटल को मजाक की तरह परोसा जाएगा और पुरुष तो ऐसे ही होते हैं कहा जाएगा तो कहीं ना कहीं ऐसा महसूस होने लगता है कि सिनेमा चीटिंग को नॉर्मलाइज कर रहा है।

डिस्क्लेमर: यह लेख लेखक की निजी राय और समझ पर आधारित है। इसका मकसद किसी व्यक्ति, जेंडर, फिल्म या समूह को निशाना बनाना नहीं है। अलग-अलग लोग फिल्मों और मीडिया को अलग तरह से समझते हैं। इसलिए इसमें कही गई बातें किसी अंतिम सच या तथ्य की तरह न ली जाएं।