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खुशनुमा खामोशी से गुजरता लफ्जों का सफर

कहने और सुनने की एक खास राजनीति के समय में वे अपने शोध का निष्कर्ष अपनी पंक्तियों में कुछ यूं निकालती हैं, ‘बस एक था/उसका गुनाह/वह बात सच्ची बोलता था’। रे की पंक्तियां बिना किसी बनावट के अभिव्यक्ति के सच को यूं उघारती हैं, ‘संशोधित/अधिशोधित/अधूरा/क्या सच सच रहा?’

Author July 12, 2019 2:57 AM
डॉक्टर विभा रे का कविता संग्रह ‘लफ्जों को रहने दो…’ और ‘ख्वाहिशें बरसती हैं’ एक ऐसी रचानकार से मिलवाता है जो कहने और सुनने के रिश्ते पर शोध करती दिखती हैं।

रोहित कुमार
चलो कभी बैठ/एक दूसरे के साथ/कुछ और न सही/हमारी चुप ही बांट लें।
मौन की/ऊंगली को थामे/चल/खुद अपने पार चलें।
डॉक्टर विभा रे का कविता संग्रह ‘लफ्जों को रहने दो…’ और ‘ख्वाहिशें बरसती हैं’ एक ऐसी रचानकार से मिलवाता है जो कहने और सुनने के रिश्ते पर शोध करती दिखती हैं। ये आज के समय की कविताएं हैं जहां अभिव्यक्तियों के साधनों के जंजाल के बीच हर इंसान खुद को अनसुना और अनकहा महसूस कर रहा है। भयानक शोर के इस समय में विभा रे की कविताएं लफ्जों की अहमियत बता रही हैं। उनकी क्षणिकाएं कम शब्दों में इंसान के कहने और सुनने के संबंधों पर शोधपत्र सा है। कहने और सुनने की एक खास राजनीति के समय में वे अपने शोध का निष्कर्ष अपनी पंक्तियों में कुछ यूं निकालती हैं, ‘बस एक था/उसका गुनाह/वह बात सच्ची बोलता था’। रे की पंक्तियां बिना किसी बनावट के अभिव्यक्ति के सच को यूं उघारती हैं, ‘संशोधित/अधिशोधित/अधूरा/क्या सच सच रहा?’

‘लफ्जों को रहने दो’ की कविताओं में एक ताजगी के साथ उदासी भी है। उदासी शोर में अकेले होते इंसान की जो एक रीतेपन से भरा है और खुद से भी जुदा हो चुका है। रे लफ्जों और खामोशी के बीच चल रही जंग को देखते हुए कहती हैं कि बोलना किस काम का जब सुनने वाले ही बहरे हो गए हैं। अपने दूसरे कविता संग्रह ‘ख्वाहिशें बरसती हैं’ में विभा रे दर्द के साज पर पीड़ा की जो आवाज निकालती हैं उसमें कुछ खोने के दुख में कुछ बोने का सुख भी है। इस संग्रह में प्रेम का रूहानी रूप कहता है, ‘तू है नहीं पर दिखाई देता है/तू कहता कुछ नहीं पर मुझे सुनाई देता है’। प्रेम में होना और उसमें खोने का सबसे सकारात्मक रूप इन पंक्तियों में दिखता है, ‘बीती हुई/बातों से/कुछ भी नहीं ढोया/हरपल नया-नया सब बोया। अब मुड़कर देखती हूं तो/सुकून है/कोई मलाल नहीं/बस तेरी तिश्नगी है/और कोई बोझिल ख्याल नहीं’। रे मानती हैं कि जीवन में प्रेम भाव तो सांस जैसा है। वे उस हालात से परेशान हैं जब मुर्दगी को जिंदगी का नाम दे दिया जा रहा है। नियम और कायदों के पहरों के बीच खामोशियां अपनी जुबान बोल ही देती हैं। शक और शिकवों की जालिम चोट से गुफ्तगू कोने में दुबक कर रो लेती है।

विभा रे आम बोल-चाल की भाषा में प्रेम का रूहानी सफर तय कर लेती हैं। प्रेम जैसे मुश्किल भाव को साधारण शब्दों के साथ बरतना मुश्किल काम होता है। गहरे विमर्शों का बोझ उठाए बिना विभा का ‘हम-तुम’ एक नया नरेटिव बनाता है। इन कविताओं में छुपी हुई स्त्री भी है और अदृश्य पुरुष भी। स्त्री हो या पुरुष प्रेम दोनों करते हैं और प्रेम के कुचले जाने का अहसास दोनों महसूसते हैं। इनकी ज्यादातर कविताएं ऐसी हैं जिनमें स्त्री और पुरुष दोनों अपनी ख्वाहिशें और अपना यथार्थ ढूंढ लेंगे।

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